सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 1289 · Raag Malaar

1श्लोक महला १॥

2हवा, पानी, अग्नि इत्यादि पंच तत्वों तथा प्राणों का संचार करके प्राणी को बना दिया। उसे अनेक खुशियाँ एवं दुख-दर्द भी मिलते हैं।

3कोई धरती, आकाश, पाताल पर रहता है तो कोई किसी द्वार पर वजीर में खुश रहता है।

4किसी को लम्बी उम्र हासिल होती है तो कोई मरकर दुख भोगता है।

5कोई इतना धनवान होता है, जितना भी उपयोग करता है, कभी कमी नहीं आती तो कोई फकीर बनकर घर-घर मांगता फिरता है।

6ईश्वर अपने हुक्मानुसार एक पल में लाखों बनाकर नष्ट भी कर देता है।

7समूची दुनिया को मालिक ने अपने नियंत्रण में किया हुआ है, अपनी रज़ा से वह हुक्म करके नुकेल तोड़ देता है।

8वह रूप-रंग, वर्ण जाति से रहित है, वह कर्म दोषों से भी रहित है।

9उसकी क्या महिमा कथन की जाए, उसके उपकारों का वर्णन भी नहीं किया जा सकता, एकमात्र वह सत्यस्वरूप ही सबकुछ है।

10करना एवं कथन सब उसी का कर्म है। हे नानक ! वह स्वयं अकथनीय है।

11जो अकथ की कथा सुनता है,

12उसे ऋद्धियाँ, सिद्धियाँ, बुद्धि एवं सुखों का घर सब प्राप्त हो जाता है।॥१॥

13महला १॥

14जो असह्य को सहन कर लेता है, उसके नौ द्वार वशीभूत हो जाते हैं।

15यदि प्राण रहने तक परमात्मा की पूजा-अर्चना की जाए तो शरीर स्थिर हो जाता है।

16कहाँ से आया है, कहाँ जाना है,

17जन्म-मरण से मुक्त होकर वही स्वीकार होता है।

18जो उसके हुक्म को मानता है, वह सार तत्व को पहचान लेता है।

19यह प्रसाद गुरु से ही मिलता है।

20हे नानक ! अभिमानी अक्सर पकड़ा जाता है,

21यदि अहम्-भाव न हो तो योनियों में नहीं पड़ता॥२॥

22पउड़ी॥

23हरिनाम का पाठ करो, उसी का स्तुतिगान करो, अन्य कार्यों में बुद्धि झूठी सिद्ध होती है।

24हरिनाम सरीखे सच्चे व्यापार बिना जीवन व्यर्थ है।

25ईश्वर का रहस्य एवं आर-पार कोई नहीं पा सका।

26समूचा जगत अहंकार में लीन है और उसे सत्य अच्छा नहीं लगता।

27परमात्मा के नाम को भुलाकर जाने वाले गर्म तवे में ही तपते हैं।

28ऐसे लोग जलती कड़ाही में दुविधा का तेल डालते हैं।

29व्यक्ति जिंदगी का खेल खेलकर संसार से चला जाता है।

30गुरु नानक फुरमाते हैं कि जो लोग परम सत्य प्रभु में मिल जाते हैं, वे उसी में रत रहते हैं।॥२४॥

31श्लोक महला १॥

32सबसे पहले मांस पिता के वीर्य से गर्भ धारण होता है और नौ महीने तक पेट रूपी मांस में रहता है।

33प्राणों का संचार हुआ तो समयानुसार मुंह, हड्डी, त्वचा, शरीर सब मांस ही मिलता है।

34गर्भाशय मांस से बाहर निकल कर बच्चे का जन्म होता है तो स्तनपान मांस रूप में खुराक मिलती है।

35इसका मुँह एवं जीभ भी मांस की होती है और मांस में ही सांस लेता है।

36जब बड़ा होता है तो विवाह रचा कर स्त्री के रूप में मांस ही घर ले आता है।

37मांस से मांस संभोग कर बच्चों के रूप में मांस पैदा करता है और मांस से ही सब रिश्ते, भाई, बहन, माता-पिता इत्यादि होते हैं।

38यदि सतिगुरु मिल जाए, ईश्वर की रज़ा को समझा जाए तो ही जीवन सफल होता है।

39हे नानक ! अपने आप मुक्त नहीं हुआ जाता और व्यर्थ बातों से नुक्सान ही होता है।॥१॥

40महला १॥

41कुछ मूर्ख लोग (स्वयं मांस खाना त्यागकर) मांस खाने पर झगड़ा करते हैं परन्तु उनको ज्ञान-ध्यान की जानकारी नहीं होती।

42क्या मांस है, क्या शाक-सब्जी है, किस में पाप है, यह नहीं जानते ।

43(माना जाता है कि) देवता मांस पर स्वाभाविक ही प्रसन्न होते हैं, इसलिए देवताओं को खुश करने के लिए होम-यज्ञ करके गैडे की बलि दी जाती थी।

44कुछ मांस खाना छोड़कर मांस की दुर्गन्ध आने पर भी नाक पकड़ लेते हैं परन्तु रात को वासना का शिकार बनाकर मांस ही तो खा जाते हैं।

45वे नाक पकड़ कर लोगों को दिखाते हैं परन्तु ज्ञान-ध्यान की कोई सूझ नहीं होती।

46हे नानक ! अन्धे को क्या बताया जाए, सच्चाई बताने पर भी नहीं समझता।

47अन्धा वही है जो कुटिल कर्म करता है, उसका हृदय तो है, मगर ज्ञान की आँखें नहीं।

48हम लोग माता-पिता के रक्त-वीर्य से उत्पन्न हुए हैं, परन्तु मांस मछली को नहीं खाते।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं