गुरु ग्रंथ साहिब 1287 · Raag Malaar
1श्लोक महला १॥
2रात और दिन में समय गुजर जाता है और
3शरीर खत्म हो जाता है।
4व्यक्ति का जीवन संसार के घंधों में लीन रहता है और
5वह परमात्मा की भक्ति एवं स्मरण को भुलाकर चूक जाता है।
6अज्ञानांध व्यक्ति व्यर्थ के कार्यों में धक्के खाता है।
7मौत के बाद परिजन रोते हैं, उसकी जिंदगी के लिए परमात्मा से अनुरोध करते हैं।
8परन्तु सत्य को समझे बिना कोई सूझ नहीं होती।
9मरने वाले पर रोते-रोते वे स्वयं ही मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं।
10हे नानक ! दरअसल मालिक को यही मंजूर है और
11असल में मरते वे हैं, जिनको परमात्मा याद नहीं आता॥१॥
12महला १॥
13मृत्यु के साथ ही मनुष्य का प्रेम-प्यार सब खत्म हो जाता है, मौत की आगोश में जाते ही सब वैर एवं झगड़े भी नष्ट हो जाते हैं।
14सुन्दर रूप-रंग भी नाश हो जाता है और दुखी शरीर मिट्टी में मिल जाता है।
15मृत्यु के उपरांत लोग बातें करते हैं (जीव) कहाँ से आया था और कहाँ चला गया है, क्या था और क्या हो गया।
16मन तथा मुँह से बातें चलती हैं और जिंदगी के मौज मेले में मस्त रहता है।
17हे नानक ! सच्चे नाम बिना सिर से पैरों तक सब प्रतिष्ठा खत्म हो जाती है॥२॥
18पउड़ी॥
19परमात्मा का नाम अमृत समान है, सदा सुख देने वाला है और अन्त में यही सहायता करता है।
20गुरु के बिना जगत बावला बना रहता है और हरिनाम को महत्व नहीं देता।
21जो अपनी आत्मा को परमेश्वर से मिला देता है, सतगुरु की सेवा में तल्लीन रहने वाला वही भक्त स्वीकार होता है।
22जो परमात्मा की रज़ा को मन में बसा लेता है, ऐसा सेवक अपने मालिक-प्रभु का रूप हो जाता है।
23जरा बताओ, अपनी मर्जी करने वाले किस व्यक्ति ने सुख पाया है, अज्ञानांध व्यक्ति कुटिल कर्म ही करता है।
24भौतिक पदार्थों से कभी तृप्ति नहीं होती और मूर्ख की भूख कदाचित दूर नहीं होती।
25द्वैतभाव में लीन रहने वाले सब लोग तंग होते हैं और सतगुरु के बिना ज्ञान प्राप्त नहीं होता।
26लेकिन जिस पर परमात्मा अपनी इच्छा से कृपा करता है, सतगुरु की सेवा करके वही सुख पाता है॥२०॥
27श्लोक महला १॥
28गुरु नानक का कथन है कि जिनके पास हरिनाम रूपी धन होता है, उनके पास शालीनता एवं धर्म दोनों ही होते हैं।
29उस धन-दौलत को साथी नहीं मानना चाहिए, जिसकी वजह से मुसीबतें एवं दण्ड भोगना पड़े।
30जिनके पास अत्याधिक घन-दौलत होता है, उनका नाम भिखारी होना चाहिए, क्योंकि धन होने के बावजूद भी वे धन ही मांगते रहते हैं।
31हे ईश्वर ! जिनके हृदय में तू बसता है, ऐसे व्यक्ति ही गुणवान हैं।॥१॥
32महला १॥
33दुनिया दुख-तकलीफें झेल कर दौलत इकट्टी करती है, जब दौलत चली जाती है तो और भी दुखी होती है।
34हे नानक ! परमात्मा की भक्ति के बिना किसी की भूख दूर नहीं होती।
35बेशक कितना ही सुन्दर रूप देखा जाए, लालसा दूर नहीं होती, जिधर भी देखा जाए, रूप-सौन्दर्य एवं धन की लालसा लगी हुई है।
36शरीर के जितने भी रस हैं, उतने ही दुख नसीब होते हैं।॥२॥
37महला १॥
38बुरे काम करने से मन भी बुरा हो जाता है, जब मन अज्ञानांध बुरा हो जाता है तो शरीर भी बुरा हो जाता है।
39जहां पत्थर का बांध भी टूट जाता है, वहां पर चूना-गारा लगाने का कोई फायदा नहीं।
40जब बांध टूट जाता है तो बेड़ी भी नहीं, तुलहा नहीं तो पार होना भी नसीब नहीं होता।
41हे नानक ! परमात्मा के स्मरण से विहीन मनुष्य कितने ही साथियों को साथ लेकर डूब जाता है॥३॥
42महला १॥
43यदि लाखों मन सोना एवं लाखों मन चांदी हो, लाखों बादशाहों का भी बड़ा बादशाह हो।
44लाखों की तादाद में सेना, हथियार, घोड़े इत्यादि का मालिक हो।
45मगर जहां संसार-समुद्र को पार करना है, वहाँ अथाह अग्नि एवं पानी मौजूद है।
46किनारा नजर नहीं आता और चीख-चिल्लाहट ही सुनाई देती है।
47हे नानक ! कौन बादशाह है, कौन शाह है, वहाँ पर ही माना जाता है।॥४॥
48पउड़ी॥
49किसी के गले में बंदगी की जंजीर पड़ जाती है,
50वह परम सत्य को मानकर संसार के बन्धनों से मुक्त हो जाता है।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं