सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 1285 · Raag Malaar · Guru Amar Daas Ji

1कई लोग नग्न ही घूमते हैं, दिन-रात सोते तक नहीं।

2कुछ आग जलाकर अपने अंगों को बिगाड़ते हैं।

3प्रभु के नाम बिना शरीर राख बन जाता है, किसी की मृत्यु पर रोने का क्या फायदा।

4जो सतिगुरु की सेवा करते हैं, मालिक के द्वार पर वही शोभा देते हैं।॥१५॥

5श्लोक महला ३॥

6जब भोर के समय पपीहे ने फरियाद की तो प्रभु के दरबार में सुनी गई।

7बादलों को हुक्म हुआ कि कृपा करके वर्षा करो।

8मैं उन पर कुर्बान जाता हूँ, जिन्होंने ईश्वर को मन में बसा लिया है।

9हे नानक ! गुरु के उपदेश द्वारा मनन कर लो, प्रभु के नाम से सब हरा-भरा हो जाता है॥१॥

10महला ३॥

11हे पपीहे ! यदि सौ बार भी फरियाद करोगे तो इस तरह तेरी प्यास दूर नहीं होगी।

12प्रभु-कृपा से सतगुरु प्राप्त होता है और कृपा से ही प्रेम उत्पन्न होता है।

13हे नानक ! जब मालिक मन में बस जाता है तो सब विकार दूर हो जाते हैं।॥२॥

14पउड़ी॥

15कुछ जैनी लोग हैं, पथभ्रष्ट रहते हैं, विधाता ने आरम्भ से ही उनका ऐसा भाग्य बनाया है।

16वे मुँह से प्रभु-नाम का भजन नहीं करते और न ही तीर्थो पर स्नान करते हैं।

17वे अपना सिर नहीं मुंडवाते बल्कि हाथों से सिर के बाल खींचकर निकाल देते हैं।

18वे दिन-रात मैले ही रहते हैं और उनको ईश्वर-शब्द से प्रेम नहीं होता।

19न उनकी जाति है, न प्रतिष्ठा है, न ही कोई कर्म है, इस तरह वे अपना जीवन व्यर्थ ही गंवा देते हैं।

20ऐसे लोगों के मन में जूठन ही विद्यमान होती है और जूठन का ही भोजन लेते हैं।

21शब्द-गुरु के आचरण के बिना किसी को परमेश्वर प्राप्त नहीं हुआ।

22जो गुरमुख बन जाता है, वह ऑकार में ही लीन रहता है॥१६॥

23श्लोक महला ३॥

24सावन के महीने में गुरु के उपदेश का चिंतन करने वाली जीव-स्त्री ही प्रसन्न होती है।

25हे नानक ! गुरु के प्रेम से वह सदा सुहागिन रहती है।॥१॥

26महला ३॥

27जिसे द्वैतभाव से प्रेम होता है, ऐसी गुणविहीन स्त्री सावन के मौसम में भी दुखों में ही जलती है।

28हे नानक ! वह पति-प्रभु की कद्र नहीं जानती और उसके सब श्रृंगार व्यर्थ ही सिद्ध होते हैं॥२॥

29पउड़ी।

30वह सच्चा अदृष्ट अभेद परमात्मा हठ कर्म से नहीं रीझता।

31कोई राग-रागनियां गाता है, इससे भी वह खुश नहीं होता।

32कुछ अनेक तालों पर नाचते हैं, परन्तु भक्ति नहीं करते।

33कोई भोजन खाना छोड़ देते हैं, इन मूर्खों का क्या किया जाए।

34मन में बहुत तृष्णा उत्पन्न होती है और किसी भी प्रकार से धैर्य नहीं होता।

35अनेक लोग कर्मकाण्ड में फंसकर मर खप जाते हैं।

36संसार में हरिनाम अमृत का पान ही लाभदायक है।

37गुरु के द्वारा परमात्मा की भक्ति-में स्नेह पैदा होता है॥१७॥

38श्लोक महला ३॥

39जो गुरु के निर्देशानुसार मलार राग गाता है, उसके मन तन को शान्ति प्राप्त होती हैं।

40गुरु की शिक्षा से एक प्रभु की पहचान होती है और एकमात्र वही सच्चा है।

41जिसके मन में सच्चा प्रभु अवस्थित होता है, उसी का मन सच्चा होता है और वह सच्चे की उपासना में ही लीन रहता है।

42जिसके अन्तर्मन में सच्ची भक्ति उत्पन्न होती है, वह स्वाभाविक ही सम्मान प्राप्त करता है।

43कलियुग में अज्ञान का घोर अंधकार फैला हुआ है, स्वेच्छाचारी को कोई रास्ता नहीं मिलता।

44हे नानक ! गुरु के द्वारा जिनके अन्तर्मन में प्रभु प्रगट होता है, वही भाग्यशाली हैं।॥१॥

45महला ३॥

46जब दया करके इन्द्र देवता बारिश करता है तो लोगों के मन में चाव उत्पन्न हो जाता है।

47जिस परमात्मा के हुक्म से इन्द्र देवता वर्षा करता है, मैं उस पर सदैव बलिहारी जाता हूँ।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं