गुरु ग्रंथ साहिब 1284 · Raag Malaar
1महला ३॥
2जिज्ञासु प्रार्थना करता है कि कृपा करके मुझे जीवन दान दो।
3प्रभु-नाम रूपी जल के बिना मेरी प्यास दूर नहीं होती, मेरे तो प्राण ही छूट जाते हैं।
4हे परमेश्वर ! तू सर्व सुख देने वाला है, बेअन्त है, गुण प्रदान करने वाला एवं शान्ति का भण्डार है।
5नानक विनती करते हैं कि हे भगवान ! गुरु के द्वारा क्षमा कर दो, अन्तिम समय तू ही सहायता करता है॥२॥
6पउड़ी॥
7जगत को उत्पन्न करके ईश्वर स्वयं ही गुण-अवगुण का विचार करता है।
8माया के तीन गुण ही सब झंझट परेशानी है, जिसकी वजह से जीव प्रभु-नाम से प्रेम नहीं करता।
9जो लोग गुणों को छोड़कर अवगुण अपनाते हैं, वे प्रभु के दरबार में दुखी ही होते हैं।
10वे अपना जीवन जुए में हार देते हैं, फिर किसलिए संसार में आए थे।
11सच्चे उपदेश से मन को मारा जा सकता है, फिर सदैव प्रभु नाम से प्रेम लगा रहता है।
12जिन पुरुषों ने सत्यस्वरूप अलख अपार प्रभु को हृदय में धारण किया है,
13उनका मानना है कि तू गुणों का दाता एवं सुखों का भण्डार है, हम अवगुणों से भरे हुए हैं।
14जिस पर कृपा करता है, गुरु के उपदेश का चिंतन करके वही उसे पा लेता है॥१३॥
15श्लोक महला ५॥
16जिनको परमात्मा का नाम भूल जाता है, ऐसे अनीश्वरवादी लोगों की जीवन रात्रि नहीं कटती।
17हे नानक ! परमात्मा का गुणगान करने वाले भक्तों का दिन-रात दोनों ही सुखद होता है॥१॥
18महला ५॥
19बेशक रत्न, जवाहर, माणिक्य इत्यादि रत्न सब पास हों, लेकिन
20हे नानक ! जो प्रभु को अच्छे लगते हैं, सच्चे दरबार में वही सुन्दर लगते हैं।॥२॥
21पउड़ी॥
22सच्चे सतिगुरु की सेवा में तल्लीन होकर परमात्मा की आराधना करनी चाहिए।
23सतिगुरु की सेवा करने से अन्तिम समय वह सेवा फल रूप में मदद करती है।
24जब सच्चा प्रभु रखवाला बन जाता है तो यमराज भी पास नहीं फटकता।
25गुरु की शिक्षा का दीया मनुष्य अपने अन्तर्मन में प्रज्वलित करता है।
26प्रभु नाम से विहीन स्वेच्छाचारी झूठे ही सिद्ध होते हैं और प्रेतों की तरह भटकते हैं।
27मनुष्य की त्वचा में ऐसे लोग पशु ही हैं, जिनका मन काला ही होता है।
28गुरु के सच्चे उपदेश से बोध होता है कि सबमें सत्यस्वरूप प्रभु ही व्याप्त है।
29हे नानक ! पूर्ण गुरु ने दिखा दिया है केि परमात्मा का नाम ही सुखों का भण्डार है॥१४॥
30श्लोक महला ३॥
31गुरु के कोमल शांत स्वभाव से जीव रूपी पपीहे को परमात्मा के हुक्म की पहचान हुई है।
32परमात्मा की दया से बादलों ने मूसलाधार बरसात की है।
33पपीहे की पुकार दूर हो गई है और मन में सुख बस गया है।
34हे नानक ! उस परमेश्वर की स्तुति करो, जो सब जीवों को रोजी रोटी देकर पोषण कर रहा है॥१॥
35महला ३॥
36हे चातक ! तू नहीं जानता कि तुझे क्या प्यास लगी है और क्या पीने से प्यास दूर हो सकती है।
37द्वैतभाव में भटकने से नाम रूपी अमृत जल प्राप्त नहीं होता।
38जब अपनी कृपा करता है तो स्वाभाविक ही सतगुरु मिल जाता है।
39हे नानक ! सच्चे गुरु से ही अमृत जल प्राप्त होता है और जीव स्वाभाविक सुख में लीन रहता है॥२॥
40पउड़ी॥
41कुछ लोग वन में जाकर बैठ जाते हैं और चुप रहकर किसी से नहीं बोलते।
42कुछ कठोर सर्दी की परवाह न करके ठण्डे जल में ही रहते हैं,
43कई अपने शरीर के अंगों पर भस्म लगाकर मैल नहीं धोते।
44कुछ ऐसे भी हैं जो विकराल जटाएँ धारण करके अपने वंश एवं गृहस्थी को छोड़ देते हैं तो
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं