गुरु ग्रंथ साहिब 1283 · Raag Malaar · Guru Amar Daas Ji
1वही सच्चे प्रभु से प्रेम करते हैं, जो गुरु के द्वारा आत्म-चिंतन करते हैं।
2हे नानक ! जब परमात्मा ही सब देने वाला है तो फिर किसी को (दाता) कैसे कहा जा सकता है॥१०॥
3श्लोक महला ३॥
4हे बावीहे ! यह जो जगत है, कोई भ्रम में मत भटकना।
5यह जीव पशु समान है, उसे कोई समझ नहीं।
6परमात्मा का नाम अमृतमय है, जिसका पान करने से प्यास बुझ जाती है।
7नानक का कथन है कि जिसने गुरु के द्वारा अमृतपान किया है, उसे पुनः प्यास नहीं लगती॥३॥
8महला ३॥
9बेशक मलार शीतल राग है, पर इस राग द्वारा प्रभु का भजन करने से ही शान्ति प्राप्त होती है।
10ईश्वर अपनी कृपा करता है तो समूचे संसार को सुख-शान्ति प्राप्त होती है।
11उसके बरसने से जीने की युक्ति प्राप्त होती है और पूरी धरती का शृंगार हो जाता है।
12हे नानक ! यह जगत सब जल ही जल है और जल से ही सब कुछ होता है।
13गुरु की कृपा से कोई विरला ही तथ्य को समझता है और वह सदा के लिए मुक्ति पा लेता है॥२॥
14पउड़ी॥
15हे परमेश्वर ! एकमात्र तू ही सबका मालिक है, सर्वाधिकार सम्पन्न है।
16तू सर्वशक्तिमान है, कोई दूसरा बड़ा नहीं माना जा सकता।
17मनुष्य का अहंकार झूठा है, तेरी महिमा ही सच्चीं है।
18दुनिया को पैदा करके जन्म-मरण बना दिया।
19जो सतिगुरु की सेवा करता है, उसी का जन्म सफल माना जाता है।
20जब मन से अहम् दूर हो जाता है तो छोटा-बड़ा मानने की बात समाप्त हो जाती है।
21स्वेच्छाघारी मोह एवं घमण्ड में लीन रहता है, उसकी दशा इस प्रकार है जैसे कोई जंगल में भटकता है।
22यदि थोड़ा-सा प्रभु का नाम-स्मरण किया जाए तो इससे असंख्य ही पाप कट जाते हैं॥११॥
23श्लोक महला ३॥
24जीव रूपी पपीहा अपने मालिक का ठिकाना नहीं जानता, यदि प्रार्थना करे तो ठिकाना देख सकता है।
25अपनी मर्जी से वह बहुत बोलता है, परन्तु ऐसा बोलना स्वीकार नहीं होता।
26केवल मालिक ही बड़ा दाता है, जो कामना होगी, वही फल प्राप्त होगा।
27बेचारा जीव रूपी पपीहा भला क्या, पूरे जगत की प्यास बुझ जाती है।॥१॥
28महला ३॥
29जीव रूपी पपीहा सुहावनी रात को सहज स्वाभाविक ही बोला कि
30परमेश्वर रूपी जल ही मेरा जीवन है, इसके बिना मैं जीवित नहीं रह सकता।
31यदि मन में से अहम्-भाव दूर किया जाए, गुरु के उपदेश द्वारा परमेश्वर रूपी जल प्राप्त हो जाता है।
32हे नानक ! जिसके बिना एक पल भी जीना मुश्किल है, सच्चा गुरु ही उससे मिलाने वाला है॥२॥
33पउड़ी॥
34संसार में असंख्य खण्ड पाताल हैं, मुझ से इनकी गणना नहीं की जा सकती।
35हे ईश्वर ! तू कर्ता पुरुष है, दरअसल तूने ही संसार बनाया है और तूने ही इसे नष्ट किया है।
36चौरासी लाख योनियों वाली पृथ्वी तुझ से ही उत्पन्न हुई है।
37कोई स्वयं को राजा, खान एवं बादशाह कहलाता है।
38कोई धन दौलत जमा करके शाह बुलवा रहा है और द्वैतभाव में अपनी इज्जत खो रहा है।
39कुछ लोग दाता बने हुए हैं, कुछ दर-दर भीख मांग रहे हैं परन्तु सबका मालिक एक ही है।
40प्रभु-नाम के बिना सब सौदा करने में लीन हैं और मौत का डर बना हुआ है।
41गुरु नानक फुरमाते हैं कि झूठ का सदैव अंत होता है और वही होता है, जो ईश्वर करता है।॥१२॥
42श्लोक महला ३॥
43हे पपीहे ! गुणवान ही ईश्वर का ठिकाना प्राप्त करता है, पर अवगुणी ईश्वर से दूर रहता है।
44ईश्वर तेरे मन में ही अवस्थित है और गुरु के द्वारा वह सदा समीप दिखाई देता है।
45अधिक शोर एवं पुकार करने से कुछ नहीं होता, अपितु कृपा-दृष्टि से ही सुख प्रदान करता है।
46हे नानक ! शब्द गुरु की साधना द्वारा नाम में लीन रहने वाले स्वाभाविक ही मिल जाते हैं॥१॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं