गुरु ग्रंथ साहिब 1282 · Raag Malaar
1पउड़ी॥
2ईश्वर अतुलनीय है, फिर भला कैसे तोला जा सकता है, उसके गुणों को तोले बिना पाया भी नहीं जा सकता।
3गुरु के उपदेश द्वारा चिंतन करके उसके गुणों में लीन रहना चाहिए।
4वह स्वयं ही अपनी महिमा को तौलने वाला है और अपने आप ही मिला लेता है।
5वह महान् है, उसका मूल्यांकन नहीं किया जा सकता, उसकी कीर्ति बताई नहीं जा सकती।
6मैं अपने गुरु पर कुर्बान जाता हूँ, जिसने सच्ची बात बताई है।
7संसार धोखा खा रहा है, नामामृत लूटना चाहिए, परन्तु स्वेच्छाचारी इस तथ्य को नहीं समझ पा रहा।
8परमात्मा के नाम बिना कुछ साथ नहीं जाता और मनुष्य अपना जीवन गंवा देता है।
9गुरु के उपदेशानुसार चलने वाले सावधान रहते हैं, अपने घर को बचा लेते हैं, नहीं तो यमदूतों का भरोसा नहीं॥८॥
10श्लोक महला ३॥
11हे पपीहे रूपी मन ! यह रोना और दुखी होना छोड़ दो, तुम्हें अपने मालिक का हुक्म मानना चाहिए।
12नानक का कथन है कि उसका हुक्म मानने से सारी प्यास मिट जाती है और खुशी का चौगुना रंग चढ़ने लगता है॥१॥
13महला ३॥
14अरे पपीहे ! जल में तेरा निवास है और जल में ही तू विचरण करता है।
15तू जल की कद्र नहीं जानता, जिसकी वजह से रोता-चिल्लाता है।
16परमात्मा रूपी जल सर्वव्याप्त है, कोई भी स्थान उससे खाली नहीं है।
17इतने जल के साथ प्यास से मरने वाले लोग बहुत दुर्भाग्यपूर्ण हैं।
18नानक फुरमाते हैं कि गुरु से जिनको सूझ प्राप्त होती है, उनके मन में प्रभु अवस्थित हो जाता है॥२॥
19पउड़ी॥
20बड़े-बड़े नाथ, सन्यासी, सिद्ध एवं पीरों में से कोई भी ईश्वर का रहस्य नहीं पा सका।
21गुरु के द्वारा नाम का ध्यान करने वाले तुझ में ही समाहित हो गए।
22छत्तीस युगों तक घोर अंधेरा परमात्मा की मर्जी थी,
23जगत-रचना से पूर्व भयानक जल ही जल फैला हुआ था।
24वह सृष्टिकर्ता शाश्वत स्वरूप, अनादि, असीम एवं अगम्य है।
25उसी ने अग्नि, लालच, भूख एवं प्यास को उत्पन्न किया है और
26द्वैतभाव में दुनिया के सिर पर मौत खड़ी कर दी है।
27परन्तु जिसने शब्द-गुरु द्वारा समझ लिया है, दुनिया के रखयाले ने उसी की रक्षा की है॥६॥
28श्लोक महला ३॥
29ईश्वर रूपी जल सर्वत्र बरसता है और प्रेम स्वभाव बरसता रहता है।
30लेकिन जीव रूपी वही वृक्ष हरे भरे होते हैं, जो गुरु के उपदेशानुसार लीन रहते हैं।
31हे नानक ! उसकी कृपा-दृष्टि होने पर ही सुख उत्पन्न होता है और जीवों का दुख दूर हो जाता है।॥१॥
32महला ३॥
33सुहावनी रात बिजली चमकती है तो मूसलाधार बरसात होने लगती है।
34जब मालिक की मजीं होती है तो इस बरसात से अधिक मात्रा में अन्न धन पैदा होता है।
35जिस नाम का सेवन करने से मन तृप्त हो जाता है और जीवों की जीवन-युक्ति उसी में लीन है।
36यह धन ईश्वर की लीला है, कभी आता है तो कभी जाता है।
37प्रभु का नाम ज्ञानी पुरुषों का सच्चा धन है और वे सदैव नाम-स्मरण में लीन रहते हैं।
38हे नानक ! जिस पर अपनी कृपा करता है, वही व्यक्ति नाम-धन प्राप्त करता है॥२॥
39पउड़ी॥
40जब करने करवाने वाला स्वयं ईश्वर ही है तो उसके सिवा किसके पास फरियाद की जाए।
41उसकी लीला अद्भुत है, वह स्वयं ही कर्म करवाता है और स्वयं ही कर्मो का हिसाब मांगता है।
42मूर्ख मनुष्य व्यर्थ ही हुक्म करता रहता है, दरअसल जो ईश्वर को उपयुक्त लगता है, वही होता है।
43वह क्षमावान् है, मुक्ति तभी होती है, जब वह मुक्त करवाता है।
44वही देखता एवं सुनता है और सबको आसरा देता है।
45सब जीवों में एक परमेश्वर ही विद्यमान है और वही विचार करता है।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं