सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 1281 · Raag Malaar · Guru Amar Daas Ji

1गुरुमुख का सम्मानपूर्वक हिसाब निपटता है और उसे स्तुति का भण्डार प्रदान किया जाता है।

2परलोक में कोई कोशिश नहीं चलती और न ही कोई फरियाद सुनी जाती है।

3वहाँ सच्चा गुरु ही मददगार होता है और अन्तिम समय बचा लेता है।

4जिनका सतगुरु रखवाला है, उन जीवों को कोई अन्य सेवा की जरूरत नहीं॥६॥

5श्लोक महला ३॥

6हे जीव रूपी पपीहे ! जिसे तू पुकार रहा है, उसे सब पाना चाहते हैं।

7वह अपनी कृपा करके ही बरसता है, जिससे पूरी प्रकृति हरित हो जाती है।

8गुरु की कृपा से प्राप्त होता है, इस तथ्य को कोई विरला ही समझता है।

9उठते-बैठते उसके ध्यान में लीन होने से सदैव सुख प्राप्त होता है।

10हे नानक ! यह अमृत सदैव ही बरसता है और गुरु ही हरिनाम स्मरण का अमृत प्रदान करता है॥१॥

11महला ३॥

12दुख-पापों से बेचैन होकर पृथ्वी ने ध्यान लगाकर प्रार्थना की।

13परमात्मा ने ध्यानपूर्वक प्रार्थना सुनी तो सहज स्वाभाविक उसे हौंसला दिया।

14इन्द्र को हुक्म किया कि मूसलाधार बरसात करो,

15इतना अधिक अन्न पैदा हो कि मूल्यांकन न किया जा सके।

16नानक का कथन है केि परमात्मा का स्तुतिगान करो, वह सब जीवों को रोज़ी रोटी देकर पोषण कर रहा है।

17जिसका दिया खाने से सुख उत्पन्न होता है और पुनः दुख नहीं लगता॥२॥

18पउड़ी॥

19हे प्रभु ! तू शाश्वत रूप है और जो सत्यशील हैं, उनको साथ मिला लेता है।

20जो द्वैतभाव में लीन रहते हैं, वे सत्य से उलट ही चलते हैं, ऐसे झूठे लोग सत्य में कभी मिल नहीं सकते।

21वह स्वयं जोड़ने एवं दूर करने वाला है और अपनी कुदरत दिखा रहा है।

22मोह, गम एवं वियोग इत्यादि सब पूर्व कर्मो का फल है।

23जो ईश्वर के चरणों में लीन रहते हैं, मैं उन पर सदैव बलिहारी जाता हूँ।

24जैसे जल में कमल अलिप्त रहता है, वैसा ही जीवन-आचरण बनाना चाहिए।

25वही लोग वास्तव में सुखी एवं सदैव सुन्दर हैं, जो मन में से अहंकार को समाप्त करते हैं।

26जो ईश्वर की भक्ति में लीन रहते हैं, उन्हें कोई गम एवं वियोग प्रभावित नहीं करता॥७॥

27श्लोक महला ३॥

28नानक की विनती है कि उस परमात्मा का स्तुतिगान करो; जिसके वश में सब कुछ हो रहा है।

29हे प्राणियो ! उसी की अर्चना करो, उसके सिवा अन्य कोई नहीं (करने वाला)।

30गुरु के द्वारा जब मन में प्रभु अवस्थित होता है, तो सदैव सुख ही सुख होता है।

31संशय बिल्कुल नहीं होता और सब चिंताएँ मन से दूर हो जाती हैं।

32जो कुछ होता है, वह स्वाभाविक ही होता है, उस बारे कुछ कहा नहीं जा सकता।

33जब सच्चा मालिक मन में अवस्थित होता है तो मनोवांछित फल प्राप्त होता है।

34हे नानक ! जिनको प्रभु अपना बना लेता है, उनकी विनती स्वयं ही सुनता है और हर बात पूरी करता है॥१॥

35महला ३॥

36कोई समझदार ही इस तथ्य को समझता है कि हरि का नामामृत सदैव बरसता है।

37गुरु से जिसने यह तथ्य समझा है, वह हरिनामामृत को हृदय में बसाकर रखता है।

38वह अहम् एवं तृष्णा को समाप्त कर हरिनामामृत ही पान करता है और सदा उसके रंग में लीन रहता है।

39हरि का नाम अमृत है और उसकी कृपा से ही बरसता है।

40नानक का कथन है कि गुरु की कृपा से प्रभु अन्तर्मन में अवस्थित होता है॥२॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं