गुरु ग्रंथ साहिब 1280 · Raag Malaar · Guru Angad Dev Ji
1वह विधाता कर्मानुसार सच्चा इन्साफ ही करता है॥३॥
2श्लोक महला २॥
3हे सखी ! सावन का सुहावना मौसम आ गया है, पति-प्रभु का स्मरण करो।
4नानक का कथन है कि जो पति-प्रभु के अलावा किसी अन्य के साथ प्रेम लगाती हैं, ऐसी बदनसीब स्त्रियाँ दुखों में ही घिरी रहती हैं।॥१॥
5महला २॥
6हे सखी ! सावन का महीना आया है, बादल खूब बरसात कर रहे हैं।
7नानक फुरमाते हैं कि जिन्होंने प्रभु से प्रेम लगाया हुआ है, ऐसी सुहागिन स्त्रियाँ सुख में लीन हैं।॥२॥
8पउड़ी॥
9ईश्वर ने स्वयं जीवन-संघर्ष डालकर संसार रूपी मल्ल-अखाड़ा बनाया है।
10जीव जबरदस्त मुकाबला करते हैं, गुरमुख सहर्ष रचे रहते हैं।
11मूर्ख एवं कच्चे स्वेच्छाचारी जीवन मुकाबले में पराजित हो जाते हैं।
12सब ईश्वर की ही लीला है, वह स्वयं मुकाबला करता है, मारने वाला भी स्वयं ही है और स्वयं ही कार्य रचता है।
13गुरु से यही सच्चाई पता लगती है कि सबका मालिक एक ही है।
14बिना कलम एवं स्याही के विधाता अपने हुक्म से सबका भाग्य लिखता है।
15सत्संगत वह मिलाप है, जहाँ सदैव परमात्मा के गुणों का बखान होता है।
16हे नानक ! सच्चे परमेश्वर की स्तुति से सत्य की पहचान होती है।॥४॥
17श्लोक महला ३॥
18झुक-झुककर बादल के रूप में प्रभु ही आया है, वह अनेक प्रकार के रंग करता है।
19मैं यह भी नहीं जानता कि प्रभु से प्रेम कैसे रहेगा।
20जिसके मन में श्रद्धा एवं प्रेम होता है, उस जीव रूपी कामिनी से ही प्रेम रहता है।
21हे नानक ! श्रद्धा-प्रेम के बिना तन को कभी सुख नसीब नहीं होता॥१॥
22महला ३॥
23बादल रूप में झुक-झुककर प्रभु ही आकर प्रेम का जल बरसा रहा है।
24हे नानक ! वह जीव रूपी कामिनी दुखी ही रहती है, जिसका प्रभु से मन टूटा हुआ है।॥२॥
25पउड़ी॥
26गृहस्थ एवं सन्यास रूपी दो रास्ते बनाकर एक वही कार्यशील है।
27वेद वाणी का प्रसार कर उसमें विवाद उत्पन्न कर दिया।
28प्रवृति (गृहस्थ जीवन) एवं निवृति (संसार से त्याग) दोनों के बीच में धर्म वकील बना हुआ है।
29स्वेच्छाचारी जीव झूठे ही सिद्ध होते हैं और वे निश्चय ही प्रभु दरबार में हारते हैं।
30गुरु-मतानुसार शब्द के अनुरूप चलने वाले योद्धा हैं, जो काम-क्रोध को खत्म कर देते हैं।
31सत्य में लीन रहने वाले शब्द द्वारा जीवन संवार लेते हैं।
32हे प्रभु ! वही भक्त तुझे अच्छे लगते हैं, जो सच्चे नाम से प्रेम करते हैं।
33जो अपने सतिगुरु की सेवा करते हैं, मैं उन पर कुर्बान जाता हूँ॥५॥
34श्लोक महला ३॥
35झुक-झुककर बादल आया है और खूब वर्षा कर रहा है।
36हे नानक ! जो प्रभु की रज़ा में चलते हैं, वे सदा आनंद मनाते हैं।॥१॥
37महला ३॥
38हे जीव ! उठ-उठकर भला क्या देख रहे हो ? इस बादल के हाथ में कुछ नहीं।
39जिसने इस बादल को भेजा है, उस प्रभु को मन में बसाकर रखो।
40दरअसल जिस पर अपनी कृपा करता है, वही उसे मन में बसाता है।
41हे नानक ! ईश्वर की कृपा-दृष्टि के बिना सब करुणा प्रलाप करते हैं॥२॥
42पउड़ी॥
43उस परमात्मा की सदैव वंदना करो, जिसे रचना करने में कोई समय नहीं लगता।
44वह रचनाकार सर्वशक्तिमान है, जो पल में आकाश को तम्बू की तरह स्थापित कर गिराने-बनाने वाला है।
45वह जगतु को उत्पन्न कर कुदरत पर विचार करता है।
46जब स्वेच्छाचारी के कर्मों का हिसाब होता है, तो वह कठोर दण्ड भोगता है।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं