सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 127 · Raag Maajh · Guru Amar Daas Ji

1जो व्यक्ति गुरु के शब्द द्वारा इस गुफा का चिन्तन करता है,

2उसके हृदय में मुरारि प्रभु का निरंजन नाम बस जाता है।

3वह भगवान की महिमा गाता है और शब्द द्वारा प्रभु के दरबार में शोभा प्राप्त करता है। फिर वह अपने प्रियतम-प्रभु से मिलकर सुख अनुभव करता है॥४॥

4कर वसूल करने वाला यम द्वैत भाव रखने वाले लोगों पर कर लगाता है।

5जो ईश्वर के नाम को विस्मृत करते हैं वह उनको दण्ड देता है।

6यम प्रत्येक जीव से प्रत्येक घड़ी एवं मुहूर्त में किए कर्मों का लेखा-जोखा लेता है और उनके अंश के कण मात्र वजन के कर्मों को भी तोलता है॥ ५॥

7जो जीव-स्त्री अपने पीहर (मृत्युलोक) में अपने पति-परमेश्वर को स्मरण नहीं करती,वह माया के प्रेम में फँसकर लुटी जा रही है, वह कर्मों का लेखा देते समय चिल्ला-चिल्ला कर विलाप करती है।

8वह नीच घराने की बहुत कुरुप और कुलक्षणी है और स्वप्न में भी वह अपने पति-परमेश्वर से नहीं मिलती॥ ६॥

9जिस जीव-स्त्री ने अपने पति-प्रभु को अपने मन में बसा लिया है,

10पूर्ण गुरु ने उसे पति-प्रभु के प्रत्यक्ष दर्शन करवा दिए हैं।

11ऐसी जीव-स्त्री अपने प्रियतम को अपने हृदय के साथ लगाए रखती है और नाम द्वारा अपने प्रियतम के साथ उसकी सुन्दर सेज पर रमण करती है॥७॥

12भगवान स्वयं ही अपने सेवक को बुला कर उसे नाम की देन प्रदान करता है।

13वह अपना नाम उसके मन में बसा देता है।

14हे नानक ! नाम द्वारा सेवक को भगवान के दरबार में बड़ी शोभा मिलती है। फिर भगवान का सेवक रात-दिन सदैव ही उसका गुणगान करता रहता है।॥८॥२८॥२९॥

15माझ महला ३ ॥

16जो व्यक्ति सत्संगति रूपी श्रेष्ठ स्थान पर रहते हैं, उनका जन्म उत्तम बन जाता है।

17ऐसे व्यक्ति अपने सच्चे गुरु की सेवा करते रहते हैं और गृहस्थ में रहते हुए भी निर्लिप्त रहते हैं।

18वह सदैव ही प्रभु के प्रेम में मग्न रहते हैं। उनका मन हरि-रस का पान करके तृप्त हो जाता है।॥१॥

19मैं उन पर कुर्बान हूँ, मेरा जीवन उन पर बलिहारी है जो ब्रह्म-ज्ञान को पढ़कर एवं समझकर अपने मन में बसाते हैं।

20गुरमुख ब्रह्म-ज्ञान को पढ़कर हरि-नाम की महिमा-स्तुति करते हैं और सत्य के दरबार में शोभा पाते हैं॥१॥ रहाउ ॥

21अलक्ष्य एवं अभेद परमात्मा सर्वव्यापक है।

22किसी भी उपाय से वह प्राप्त नहीं किया जा सकता।

23यदि परमात्मा कृपा करे तो मनुष्य को गुरु मिल जाता है। परमात्मा अपनी कृपा-दृष्टि से मनुष्य को सतिगुरु से मिलाकर उस द्वारा अपने साथ मिला लेता है॥२॥

24जो व्यक्ति द्वैतभाव के कारण ग्रंथों का अध्ययन करता है, उसे कुछ भी ज्ञान प्राप्त नहीं होता।

25वह त्रिगुणात्मक माया के लिए उलझता रहता है।

26लेकिन त्रिगुणात्मक माया के बंधन गुरु के शब्द से टूट जाते हैं और गुरु के शब्द से ही मोह-माया से मोक्ष प्राप्त होता है।॥३॥

27मनुष्य का यह मन बड़ा ही चंचल है और यह मनुष्य के वश में नहीं आता।

28यह दुविधा उत्पन्न करने वाली माया के पीछे लगकर दसों दिशाओं में भटकता रहता है।

29इस तरह मनुष्य विष-रूपी माया का कीड़ा बनकर विष रूपी विषय-विकारों में मग्न रहता है और विष रूपी माया के विषय-विकारों में ही गल-सड़ जाता है॥४ ॥

30जो व्यक्ति अहंकार से बोलता है और स्वयं को बड़ा प्रगट करता है,

31वह अधिकतर धर्म-कर्म करता है परन्तु प्रभु के दरबार में स्वीकार नहीं होता।

32हे प्रभु ! तेरे हुक्म से बाहर कुछ भी नहीं होता। जिसे तुम क्षमा कर देते हो, वह शब्द द्वारा सुन्दर बन जाता है॥५॥

33मनमुख जन्मता एवं मरता रहता है। उसे भगवान का ज्ञान ही नहीं होता।

34वह रात-दिन माया के मोह में फँसकर भटकता रहता है।

35इस तरह मनमुख व्यक्ति अपना अमूल्य जन्म व्यर्थ ही गंवा देता है और अन्त में पश्चाताप करता हुआ जगत् से चला जाता है। ६॥

36जैसे कोई स्त्री जिसका पति तो परदेस गया हुआ है परन्तु फिर भी वह अपने शरीर का श्रृंगार करती रहती है।

37वैसे ही मनमुख माया मे अंधा हो ऐसे व्यर्थ कर्म करता है,

38उसकी न इहलोक में शोभा होती है और न ही उसे परलोक में कोई सहारा मिलता है। उसका जीवन व्यर्थ ही चला जाता है॥७ ॥

39किसी विरले ने ही भगवान के नाम को जाना है।

40नाम की पहचान पूर्ण गुरु के शब्द द्वारा ही होती है।

41जो व्यक्ति दिन-रात हर समय भगवान की भक्ति करता रहता है, उसे सहज ही सुख उपलब्ध हो जाता है॥ ८॥

42एक परमेश्वर समस्त जीवों में मौजूद है।

43परन्तु इस भेद को गुरु के माध्यम से कोई विरला पुरुष ही समझता है।

44हे नानक ! भगवान के दरबार में वह व्यक्ति शोभा प्राप्त करते हैं, जो उसके नाम में मग्न रहते हैं। भगवान स्वयं ही कृपा करके जीव को अपने साथ मिला लेता है ॥७॥२६॥३०॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं