गुरु ग्रंथ साहिब 1278 · Raag Malaar · Guru Amar Daas Ji
1गुरु के उपदेश द्वारा प्रभु भक्ति में लीन रहते हैं।॥७॥
2प्रभु कृपा करता है, अपना प्रेम प्रदान करता है।
3संसार में अभिमान बहुत बड़ा रोग है और
4गुरु की कृपा से ही यह रोग दूर होता है।
5हे नानक ! जीव सत्यशील बनकर सत्य में ही लीन रहता है॥८॥१॥३॥५॥८॥
6रागु मलार छंत महला ५ ॥
7ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
8प्रेम व भक्ति का दाता ईश्वर
9अपने भक्तो में लीन रहता है।
10वह दिन-रात भक्तों के अनुराग में रत रहता है और एक पल भी मन से नहीं भूलता।
11वह संसार का पालक है, वह गुणों का भण्डार सदैव साथ रहता है, वह जगदीश्वर सर्वगुण सम्पन्न है।
12उसके चरणों की संगत ने मन मोह लिया है, भक्तजन हरिनाम के रस में मस्त रहते हैं।
13हे नानक ! वह प्रियतम प्रभु कृपा का घर है, करोड़ों में से कोई विरला ही उसकी महिमा को जानता है॥१॥
14हे प्रियतम प्रभु ! तेरी महिमा अगम्य अपार है,
15महा पतित जीवों को भी तूने संसार-सागर से पार कर दिया है।
16हे स्वामी ! तू पापियों को पावन करने वाला है, भक्तों से प्रेम करने वाला एवं कृपा का समुद्र है।
17हे अन्तर्यामी ! संत पुरुषों की संगत में निःसंकोच तेरे भजन में लीन रहूँ।
18जो करोड़ों जन्मों से योनियों में भटक रहे थे, नाम-स्मरण करके वे भी मुक्त हो गए हैं।
19नानक की विनती है कि हे श्री हरि ! तेरे दर्शनों की तीव्र लालसा है, स्वयं ही संभाल लो॥२॥
20मेरा मन परमात्मा के चरण कमल में लीन है।
21हे प्रभु ! तू जल की तरह है और भक्त तेरी मछलियाँ हैं।
22जल एवं मछली एक तू ही है, इसे अलग नहीं माना जा सकता।
23हमारी बांह पकड़कर नाम ही प्रदान करो, तो ही तेरी कृपा मानेंगे।
24साधुओं की संगत में एकाग्रचित होकर कृपालु परमेश्वर का भजन करो।
25नानक की विनती है कि हे परमपिता ! हम अनाथ एवं दीन तेरी शरण में आए हैं, दया करके अपना बना लो॥३॥
26ईश्वर ने अपने आपको आप ही मिलाया है और
27वह हरि-प्रभु सब भ्रम नाश करने वाला है।
28उस स्वामी की लीलाएँ अद्भुत हैं, वह अन्तर्यामी, गुणों का भण्डार, प्रियतम अपनी कृपा से ही मिलता है।
29हे परमेश्वर ! नित्य तेरा गुणगान करने से महामंगल एवं सुख उत्पन्न होता है।
30तुझसे मिलकर ही जीव शोभा देता है, तेरे दर्शन मन को मोह लेने वाले हैं और उत्तम भाग्य से ही प्राप्त होता है।
31नानक विनती करते हैं कि हम उनकी शरण चाहते हैं, जिन्होंने परमात्मा का ध्यान किया है॥४॥१॥
32वार मलार की महला १ राणे कैलास तथा मालदे की धुनि ॥
33ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
34श्लोक महला ३॥
35गुरु को मिलकर मन यूं खिल जाता है, जैसे वर्षा होने से धरती की सजावट हो जाती है।
36हर जगह हरियाली ही दिखाई देती है और तालाब व सरोवर पानी से भर जाते हैं।
37मून सृत्य के रंग में लीन होकर मजीठ की तरह लाल हो जाता है।
38सत्य में मन कमल की तरह खिलं उठता है और गुरु के उपदेश से निहाल हो जाता है।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं