गुरु ग्रंथ साहिब 1277 · Raag Malaar · Guru Amar Daas Ji
1मन में भलीभांति मनन करके देख लो, सतगुरु के बिना किसी ने परमात्मा को नहीं पाया।
2प्रभु की कृपा से सतगुरु प्राप्त होता है और स्वाभाविक ही उससे भेंट होती है।
3स्वेच्छाचारी भ्रम में भूला रहता है और भाग्य के बिना उसे हरिनाम धन प्राप्त नहीं होता॥५॥
4तीन गुण केवल माया ही है और पण्डित पढ़-पढ़कर चिंतन करते हैं।
5उससे कभी मुक्ति प्राप्त नहीं होती और न ही मोक्ष का द्वार मिलता है।
6सतगुरु के बिना संसार के बन्धन नहीं टूटते और न ही हरिनाम से प्रेम लगता है॥६॥
7वेदों के पाठ-पठन का अभ्यास करके पण्डित एवं मौनी भी थक गए हैं।
8इससे परमात्मा के नाम का स्मरण नहीं होता और न ही सच्चे घर में निवास प्राप्त होता है।
9मृत्यु का भय सिर से दूर नहीं होता और अन्तर्मन का कपट नष्ट कर देता है॥७॥
10नि:संकोच सब लोग हरिनाम के आकांक्षी हैं, पर यह भाग्य के बिना प्राप्त नहीं होता।
11ईश्वर की कृपा से जब गुरु से भेंट होती है तो मन में हरिनाम अवस्थित हो जाता है।
12हे नानक ! हरिनाम से ही संसार में यश मिलता है और जीव हरि में ही लीन रहता है॥८॥२॥
13मलार महला ३ असटपदी घरु २ ॥
14ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
15जिस पर ईश्वर कृपा करता है, उसे गुरु की सेवा में लगा देता है।
16वह उसके दुखों को दूर करके ईश्वर के नाम-स्मरण में तल्लीन करता है।
17यदि सच्चे परमेश्वर में ध्यान लगाएं तो सच्ची गति होती है,
18गुरु की वाणी शब्द सुनाती है॥१॥
19हे मेरे मन ! ईश्वर की उपासना सर्व सुखों का भण्डार है और
20गुरु की कृपा से ही हरिनाम धन प्राप्त होता है, तदन्तर सहज स्वाभाविक परमात्मा में ध्यान लगा रहता है॥१॥रहाउ॥
21जो स्त्री अपने पति के बिना श्रृंगार करती है,
22वह कुलच्छनी कहलाती है और हर रोज़ दुखी होती है।
23स्वेच्छाचारी पुरुष का भी ऐसा ही बुरा आचरण होता है,
24वह परमात्मा के नाम को भूलकर अनेक कर्मकाण्ड करता है॥२॥
25गुरमुख जीव-स्त्री ही भला श्रृंगार करती है।
26वह गुरु के उपदेश द्वारा प्रियतम प्रभु को अपने हृदय में बसाकर रखती है।
27वह अहंकार को समाप्त कर एक प्रभु को पहचानती है,
28इस प्रकार ऐसी स्त्री ही शोभावान कही जाती है॥३॥
29गुरु के बिना कोई भी दाता को नहीं पा सका और
30स्वेच्छाचारी लालच एवं द्वैतभाव में ही लिप्त रहता है।
31कोई ज्ञानी ही इस तथ्य को बूझता है कि
32गुरु से भेंट के बिना मुक्ति नहीं होती॥४॥
33बातें कर-करके हर कोई भक्ति की बात करता है
34परन्तु मन को मारे बिना भक्ति नहीं होती।
35ज्ञान बुद्धि से ही हृदय कमल खिलता है।
36जिस दिल में नाम होता है, वह प्रभु नाम में ही लीन रहता है॥५॥
37लोग अहम्-भाव में भक्ति करते हैं,
38इससे न मन भोगता है और न ही सुख प्राप्त होता है।
39वे बातें करके अपने अहम् को सिद्ध करते हैं।
40ऐसी भक्ति व्यर्थ ही जाती है और वे पूरा जीवन खो देते हैं।॥६॥
41वही भक्त सतगुरु के मन को भाते हैं जो
42रात-दिन नाम-स्मरण में लीन रहते हैं।
43वै सदैव प्रभु को साक्षात् देखते हैं और
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं