गुरु ग्रंथ साहिब 1276 · Raag Malaar
1मलार महला ३ असटपदीआ घरु १ ॥
2ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
3ईश्वर की कृपा हो तो सच्चा गुरु प्राप्त हो जाता है और कृपा के बिना वह प्राप्त नहीं होता।
4जब परमात्मा की इच्छा होती है तो सच्चे गुरु से मिलकर जीव सोने की तरह शुद्ध हो जाता है।॥१॥
5हे मेरे मन ! परमात्मा के नाम में ध्यान लगाओ।
6सच्चे गुरु से परमात्मा प्राप्त होता है और जीव सत्यस्वरूप प्रभु में विलीन रहता है॥१॥रहाउ॥
7जब सच्चे गुरु की शिक्षा से ज्ञान उत्पन्न होता है तो हर संशय दूर हो जाता है।
8सतगुरु से ही ईश्वर का रहस्य प्राप्त होता है और गर्भ योनियों से छुटकारा हो जाता है।॥२॥
9गुरु की कृपा से जो जीते जी विकारों की ओर से मरकर शब्द के अनुरूप आचरण करता है, वह जीवन्मुक्त हो जाता है।
10जो मन में से अहम्-भाव को निवृत्त कर देते हैं, वही मुक्ति प्राप्त करते हैं॥३॥
11गुरु की कृपा से जीव जब चेतना के घर जन्म लेता है तो माया-शक्ति को दूर कर देता है।
12वह सहनशीलता अपनाकर विवेक बुद्धि प्राप्त करता और महापुरुष गुरु के संपर्क में रहकर प्रभु से मिल जाता है॥४॥
13नासमझ संसार बाजी खेलता है और अपना मूल गंवा कर चला जाता है।
14यदि सत्संगति में हरिनाम का स्तुतिगान किया जाए तो ही लाभ प्राप्त होता है, पर यह भी बड़े भाग्य से ही प्राप्त होता है॥५॥
15मन में चिंतन करके देख लो, सतगुरु के बिना किसी को ईश्वर प्राप्त नहीं हुआ।
16जो भाग्यशाली होते हैं, वे गुरु को पाकर संसार-सागर से पार उतर जाते हैं।॥६॥
17हरिनाम ही हमारा अवलम्ब है और हरिनाम का ही आसरा है।
18हे ईश्वर ! कृपा करके गुरु से मिला दो, ताकि मोक्ष द्वार प्राप्त हो जाए॥७॥
19मालिक ने प्रारम्भ से जो भाग्य मस्तक पर लिख दिया है, उसे टाला नहीं जा सकता।
20नानक कथन करते हैं कि जिनको ईश्वर की रज़ा अच्छी लगती है, वही व्यक्ति पूर्ण माने जाते हैं।॥८॥१॥
21मलार महला ३ ॥
22वेद-वाणी के अनुरूप पूरा जगत कार्यशील है, तीन गुणों का चिंतन करता है।
23हरिनाम के मनन बिना यमराज से दण्ड भोगता है और बार-बार मरता एवं जन्मता है।
24जिसकी सतगुरु से भेंट होती है, वह मुक्ति पा लेता है और मोक्ष द्वार में प्रवेश कर जाता है।॥१॥
25हे मन ! सच्चे गुरु की सेवा में तल्लीन रहो,
26क्योंकि पूर्ण गुरु बड़े भाग्य से ही प्राप्त होता है, तदन्तर हरिनाम का ध्यान किया जाता है॥१॥रहाउ॥
27परमेश्वर अपनी मर्जी से ही समूची सृष्टि को उत्पन्न करता है और रिजक ( रोजी,आजीविका) देकर स्वयं ही आसरा प्रदान करता है।
28ईश्वरेच्छा से मन निर्मल होता है और परमेश्वर के साथ प्रेम उत्पन्न होता है।
29परमात्मा की रज़ा से सतगुरु से साक्षात्कार होता है और वह जीवन सफल कर देता है॥२॥
30कोई गुरु से ही इस रहस्य को समझता है कि परमात्मा की वाणी सत्य एवं प्रशंसनीय है।
31वह वाह-वाह करता प्रभु की सराहना करता है, क्योंकि उस जैसा बड़ा अन्य कोई नहीं।
32वह स्वयं ही कृपा करके अपने साथ मिला लेता है और उत्तम भाग्य से ही प्राप्त होता है॥३॥
33वह सच्चा मालिक सर्वाधिकार सम्पन्न है, गुरु ने उसके दर्शन करवाए हैं।
34जब नाम अमृत की वर्षा होती है तो मन संतुष्ट हो जाता है और प्रभु में ध्यान लगा रहता है।
35परमात्मा के नाम-स्मरण से मन सदा हरा-भरा रहता है, फिर सूखकर मुरझाता नहीं॥४॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं