सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 1275 · Raag Malaar · Guru Nanak Dev Ji

1गुरु की शिक्षा से ही रास्ते की जानकारी होती है और

2गुरु के आसरे सच्चा बल प्राप्त होता है।

3सुन्दर वाणी से नाम स्मरण करता है और

4यदि तुझे मंजूर हो तो तेरा द्वार पहचान लेता है॥२॥

5चाहे चला जाऊँ या बैठा रहूँ, एक ईश्वर में ध्यान लगा हुआ है।

6गुरु के उपदेश से जिसके पास नाम का आसरा है,

7उसे जल, पर्वत एवं ऊँची धाराएँ भी प्रभावित नहीं करतीं।

8उसे सच्चे घर में निवास मिल जाता है और किसी कठिन रास्ते पर नहीं चलना पड़ता॥३॥

9जिस घर में रहता है, तू ही विधि जानता है, किसी अन्य को ज्ञान नहीं होता।

10सतगुरु के बिना समझ नहीं होती और पूरा संसार अज्ञान के कचरे में दबा पड़ा है।

11रोता-चिल्लाता है, परन्तु गुरु के बिना हरिनाम का सुमिरन (स्मरण) नहीं होता।

12यदि गुरु की शिक्षा को पहचान लिया जाए तो पल में ही प्रभु नाम द्वारा बन्धनों से छुटकारा हो जाता है॥४॥

13कुछ मूर्ख, अंधे, अनाड़ी एवं गंवार लोग हैं,

14कई ऐसे भी हैं जो सतिगुरु के प्रेम में नाम-स्मरण के आसरे जी रहे हैं।

15गुरु की वाणी शुद्ध, मीठी एवं अमृत की धारा के समान है,

16जिसने इसका पान किया है, उसे मुक्ति मिल गई है॥५॥

17श्रद्धा-भावना से प्रभु का नाम हृदय में बसाओ, गुरु की वाणी द्वारा सच्चा कार्य करो।

18जब वर्षा होती है तो धरती सुन्दर हो जाती है, घट घट में ईश्वर की ज्योति व्याप्त है।

19जैसे बंजर धरती में बीज बोने से कोई लाभ नहीं होता, वैसे ही खोटी बुद्धि वाले निगुरे की यही निशानी है कि जितना भी उसे उपदेश दिया जाए, उस पर कोई असर नहीं होता।

20गुरु के बिना घोर अंधेरा ही है और प्राणी बिना पानी के ही डूब मरता है॥६॥

21जो कुछ होता है, वह प्रभु की रज़ा है।

22जो विधाता लिख देता है, उसे बदला नहीं जा सकता।

23जीव उसके हुक्म के अन्तर्गत ही कर्म करता है।

24एक शब्द में लीन व्यक्ति सत्य में विलीन हो जाता है।॥७॥

25हे प्रभु ! चारों दिशाओं में तेरा हुक्म चलता है, चहुं दिशाओं एवं पाताल में तेरा नाम ही फैला हुआ है।

26सबमें शब्द ही व्याप्त है और कर्म से ही सच्चा प्रभु मिलता है।

27जन्म-मरण, भूख, नींद एवं काल सिर पर खड़े दिखाई दे रहे हैं।

28हे नानक ! यदि ईश्वर की करुणा-दृष्टि हो जाए तो मन को भाने वाला नाम मिल जाता है।॥८॥१॥४॥

29मलार महला १ ॥

30लोग मृत्यु एवं मुक्ति की उपयोगिता को नहीं जानते।

31किनारे पर बैठी जीव-स्त्री ही गुरु के उपदेश द्वारा जान पाती है॥१॥

32हे जीव रूपी पक्षी ! तू क्योंकर जाल में फंसी हुई है।

33अदृष्ट को देख नहीं पाती, अपने हृदय में परमात्मा का चिंतन कर॥१॥रहाउ॥

34अपना पेट भरने के लिए तू कितने ही जीवों को खाती है।

35जल में तैरते हुए जल में डूब मरती हो।॥२॥

36सब जीवों को तूने दुखी किया है,

37जब पकड़ी गई तो पछताना पड़ा॥३॥

38जब गले में मौत का भारी फंदा पड़ता है तो

39पंख फैलाकर उड़ नहीं सकती॥४॥

40मूर्ख स्वेच्छाचारी भोग विलासों का दाना चुगता रहता है परन्तु

41सद्गुणों एवं ज्ञान का चिंतन करने से बन्धनों के फंदे से छुटकारा होता है।॥५॥

42सतगुरु की सेवा से यमकाल का भय नष्ट हो जाता है और

43हृदय में सच्चे उपदेश का मनन करता है॥६॥

44गुरु की शिक्षा शाश्वत है और उसका शब्द ही उपयोगी है।

45उसी से परमात्मा का नाम हृदय में अवस्थित होता है॥७॥

46जो लोग भोग-विलासों में लीन रहते हैं, वे केवल दुख ही दुख पाते हैं।

47गुरु नानक का मत है कि सच्चे नाम के स्मरण बिना मुक्ति संभव नहीं॥८॥२॥५॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं