गुरु ग्रंथ साहिब 1274 · Raag Malaar · Guru Nanak Dev Ji
1यह जगत् कागज का एक किला है, इसकी रंगीनी, चिन्ह, चतुराई ही है।
2छोटी-सी बूंद एवं पवन चलने से इसकी शोभा खत्म हो जाती है और पल में जीवन मृत्यु में बदल जाता है।॥४॥
3अगर नदी के किनारे कोई घर अथवा पेड़ हो और उस घर में नागिन रहती हो।
4नदी के उलटते ही घर एवं पेड़ तबाह हो जाते हैं और नागिन घर से उजड़ कर द्वैतभाव में लोगों को डंसने लगती है॥५॥
5गुरु का ज्ञान, ध्यान, वचन एवं शिक्षा गारुड़ी मंत्र के रूप में जहर को समाप्त कर देता है।
6मन तन शांत हो जाते हैं, सत्य एवं भगवान की विलक्षण भक्ति प्राप्त होती है।॥६॥
7हे परमात्मा ! जितनी भी दुनिया है, तुझ से ही मांगती है, तू सब जीवों पर दया करता है।
8हम तुम्हारी शरण में आ गए हैं, हमारी लाज रखना, हम सत्य में ही मिलना चाहते हैं॥७॥
9अपने-अपने काम-धंधों में व्यस्त लोग अज्ञानांध हैं, उन्हें कोई सूझ नहीं होती, इसी वजह से हत्या एवं अत्याचार के काम करते हैं।
10जब सच्चा गुरु मिल जाता है तो भले-बुरे की समझ आ जाती है, मन में सत्य एवं ज्ञान का आलोक हो जाता है।॥८॥
11जब मैंने अपने गुरु से पूछा तो उन्होंने बताया कि यह गुणविहीन शरीर सत्य के बिना नाशवान् है।
12हे नानक,! गुरु ही प्रभु के दर्शन करवाता है, सत्य के बिना पूरा जगत सपना है॥९ ॥२॥
13मलार महला १ ॥
14चातक एवं मछली जल से ही सुख प्राप्त करते हैं और हिरण को संगीत की ध्वनि ही अच्छी लगती है॥१॥
15हे मेरी माई ! रात भर जिज्ञासु पपीहा बोलता है।॥१॥रहाउ॥
16प्रियतम प्रभु के साथ प्रेम कभी समाप्त नहीं होता है, जो प्रभु को अच्छा लगता है, वही प्रेम है॥२॥
17प्रभु के प्रेम में नींद दूर हो गई है, शरीर से अभिमान थक गया है और हृदय में सच्चा उपदेश समा गया है॥३॥
18बेशक पेड़ों-वृक्षों पर पक्षियों की तरह उड़ता हूँ तो भी भूखा रहता हूँ, सहज स्वाभाविक नामामृत को पी कर तृप्त होता हूँ॥४॥
19ऑखें तरस रही हैं, जीभ सूख रही है दर्शनों की प्यास के लिए॥५॥
20प्रियतम के बिना जितना श्रृंगार करती हूँ, शरीर उतना ही जलता है और कपड़े भी सुन्दर नहीं लग रहे॥६॥
21अपने प्रियतम के बिना एक पल भी रह नहीं सकती और उसके मिलन बिना नींद नहीं आती॥७॥
22प्रियतम प्रभु निकट ही था, मैं बेचारी समझ नहीं पाई।परन्तु सच्चे गुरु ने दर्शन करा दिए हैं।॥८॥
23जब सहज स्वाभाविक प्रभु से मिलन हुआ तो परम सुख पाया और उसके शब्द से सारी तृष्णा बुझ गई॥६॥
24नानक का कथन है कि हे ईश्वर ! मेरा मन तुझ से संतुष्ट हो गया है, इसका मूल्यांकन नहीं किया जा सकता॥१०॥३॥
25मलार महला १ असटपदीआ घरु २
26ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
27पृथ्वी जल के भार से झुकी हुई है,
28पर्वत ऊँचे हैं और खाइयाँ पाताल तक हैं।
29गुरु की शिक्षा का मनन करने से संसार-सागर शीतल हो जाता है,
30अहम् को मारकर मुक्ति का मार्ग सरल हो जाता है॥१॥
31मुझ अंधे के पास प्रभु-नाम की ज्योति है और
32गुरु के प्रेम एवं शांत स्वभाव द्वारा नाम के आसरे ही चला जाता है।॥१॥रहाउ॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं