सिख धर्म
वापस

गुरु ग्रंथ साहिब 1272 · Raag Malaar · Guru Arjan Dev Ji

1जो ईश्वर के संगी-साथियों के साथ हरिनाम की माला फेरते हैं,

2हे नानक ! उनको प्रियतम प्रभु प्राणों से भी प्रिय होता है॥२॥१॥२३॥

3मलार महला ५ ॥

4यह मन घने वन में भटकता फिरता है,

5उमंगपूर्ण चाल चलता है

6उसे प्रभु मिलन की चाह है ॥१॥रहाउ॥

7तीन गुणों वाली माया मोहित कर रही है, मैं अपनी पीड़ा किंसको बताऊँ॥१॥

8अन्य सभी उपाय इस्तेमाल कर लिए हैं, पर दुख दूर नहीं हो सके।

9हे नानक ! साधु महापुरुषों की शरण में मिलकर परमात्मा का भजन गान करो॥२॥२॥२४॥

10मलार महला ५ ॥

11प्रियतम प्रभु की शोभा सुन्दर एवं भली है।

12गंधर्व एवं स्वर्ग की अप्सराएँ प्रभु के मीठे गुण गा रही हैं।॥१॥रहाउ॥

13उसकी सुन्दर शोभा को अनेक प्रकार से गुणवान् उच्चारण कर रहे हैं और अपना सुन्दर रूप दिखा रहे हैं।॥१॥

14पहाड़, पेड़, धरती, जल, भवन, घट-घट में व्याप्त प्रियतम प्रभु की प्रशंसा गा रहे हैं।

15हे नानक ! जिनके अन्तर्मन में पूर्ण श्रद्धा-भावना है, वे साधु-महात्मा जनों के साथ ईश्वर के गुणगान का आनंद पा रहे हैं।॥२॥३॥२५॥

16मलार महला ५ ॥

17प्यारे गुरु के चरण-कमल को मन में धारण किया है।॥१॥रहाउ॥

18गुरु का दर्शन फलदायक है, दर्शन करने से सब पाप दूर हो जाते हैं और मन निर्मल एवं उज्ज्वल हो जाता है।॥१॥

19यह अद्भुत लीला देखकर

20बड़ा आश्चर्य होता है कि

21परमात्मा का नाम लेने से करोड़ों पाप नाश हो जाते हैं।

22गुरु के चरणों में शीश रख दिया है,

23हे प्रभु ! एक तू ही हमारा रखवाला है, एक तू ही हमारा आसरा है।

24भक्त तुम्हारी शरण में हैं।

25नानक का कथन है कि हम तेरे द्वार पर तेरी शरण में आए हैं।॥२॥४॥२६॥

26मलार महला ५ ॥

27हे गुरु रूपी बादल ! भगवान की आज्ञा से नाम की वर्षा कर दो,

28सबके भाग्य जाग जाएँ और आनंद ही आनंद हो।॥१॥रहाउ॥

29संत पुरुषों के साथ मन यूं खिल उठता है, जिस प्रकार धरती बादलों को देखकर खुश होती है।॥१॥

30ज्यों बादलों की ध्वनि सुनकर मोर में प्रेम उत्पन्न होता है,

31पपीहे का मन स्वाति बूंद से आनंदमय होता है,

32वैसे ही परमात्मा के साथ मन मोहित है।

33हे नानक ! माया एवं ईष्य द्वेष को त्याग दिया है और

34संतों को मिलकर सावधान हो गया हूँ॥२॥५॥२७॥

35मलार महला ५ ॥

36हे सज्जनो ! नित्य परमात्मा का गुणगान करो;

37मन में राम नाम को धारण करो।॥१॥रहाउ॥

38मान अभिमान को छोड़कर साधु पुरुषों के साथ मिलकर रहो।

39हे मित्र ! एकाग्रचित होकर ईश्वर का स्मरण करो, सब पाप-दोष मिट जाएँगे॥१॥

40जब परब्रह्म दयालु होता है तो

41विषय-विकारों के जंजाल नष्ट हो जाते हैं।

42हे नानक ! साधुजनों के चरणों में लगकर

43सदैव ईश्वर का यशोगान करो॥२॥६॥२८॥

44मलार महला ५ ॥

45गुरु रूपी बादल ईश्वर की कीर्ति गा रहा है।

46गुरु शरण में परमेश्वर के गुण गाते हुए सुख चैन मिलता है॥१॥रहाउ॥

47ईश्वर के चरणों की शरण संसार-सागर से पार उतारने वाली है, मधुर वचनों से अनाहत ध्वनि ही गूंज रही है॥१॥

48जब जिज्ञासु को प्रभु मिलन की प्यास लगती है तो वह अपना चित नाम-जल के सरोवर में लगाता है।

49भक्तों को प्रभु-दर्शनों का ही प्रेम है, नानक कथन करते हैं कि प्रभु कृपा करके ही दर्शन देता है।॥२॥७॥२६॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं