सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 1270 · Raag Malaar

1मलार महला ५ ॥

2भक्तों से प्रेम करना प्रभु का स्वभाव है,

3अतः वह निंदकों को मार कर अपने चरणों के नीचे दबा देता है और इस प्रकार सम्पूर्ण विश्व में अपने यश को फैलाता है॥१॥रहाउ॥

4समूचे जगत में उसी की जय-जयकार हो रही है, वह सदैव जीवों पर दया करता है।

5वह अपने भक्तों को गले से लगाकर रखता है और उनको कोई गर्म वायु अर्थात् दुख तकलीफ छूने नहीं देता॥१॥

6मेरे स्वामी प्रभु ने सहायता की तो भ्रम भय मिटाकर सुख प्राप्त कर दिया।

7हे भक्तो ! तुम महा आनंद प्राप्त करो, नानक के मन में परमात्मा पर पूर्ण विश्वास बन गया है॥२॥१४॥१८॥

8रागु मलार महला ५ चउपदे घरु २

9ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

10गुरु-मुख को सम्पूर्ण संसार ब्रह्म रूप फैला हुआ दिखाई देता है,

11सब ओर तीन गुणों का विस्तार दृष्टिगत होता है।

12गुरु का शब्द वेद मंत्रों का चिंतन है और

13पूर्ण गुरु के बिना घोर अंधकार है॥१॥

14हे मेरे मन ! गुरु का नाम जपने से सदैव सुख प्राप्त होता है।

15गुरु के उपदेश से परमात्मा हृदय में अवस्थित होता है, अतः श्वास-ग्रास से अपने मालिक का चिंतन करो॥१॥रहाउ॥

16गुरु के चरणों पर कुर्बान होना चाहिए।

17प्रतिदिन गुरु के गुण गाओ।

18गुरु की चरण-धूल में स्नान करो एवं

19सच्चे दरबार में सम्मान प्राप्त करो॥२॥

20गुरु भयानक संसार-सागर से पार उतारने वाला जहाज है।

21यदि गुरु से साक्षात्कार हो जाए तो जन्म-मरण का चक्र छूट जाता है।

22गुरु की सेवा वही व्यक्ति प्राप्त करता है,

23जिसके भाग्य में विधाता ने लिखा होता है।॥३॥

24गुरु ही मेरा जीवन है, एकमात्र वही मेरा आसरा है।

25गुरु ही मेरा जीवन-आचरण एवं परिवार है।

26गुरु ही मेरा मालिक है, अतः उस सच्चे गुरु की शरण में रहता हूँ।

27नानक फुरमाते हैं कि गुरु ही परब्रह्म है, उसकी महत्ता अवर्णनीय है॥४॥१॥१९॥

28मलार महला ५ ॥

29जब गुरु के चरण हृदय में बस जाते हैं तो

30प्रभु कृपा करके स्वयं ही मिला लेता है।

31प्रभु अपने जिस सेवक को भक्ति में लगा लेता है,

32उसकी महता व्यक्त नहीं की जा सकती॥१॥

33हे पूर्ण सुखदाता ! कृपा करो,

34तुम्हारी कृपा से ही तू स्मरण आता है और आठ प्रहर तेरी भक्ति में लीन रहते हैं।॥१॥रहाउ॥

35हे स्रष्टा ! तेरा कीर्तिगान करना एवं सुनना सब तेरी रज़ा है।

36जो हुक्म मानता है, वह सत्य में लीन हो जाता है।

37हम तेरा नाम जप जपकर ही जीते हैं और

38तेरे सिवा अन्य कोई ठिकाना नहीं॥२॥

39दुख एवं सुख परमात्मा के हुक्म एवं रज़ा के अन्तर्गत है।

40वह अपनी रज़ा से किसी को क्षमा कर देता है तो किसी को सजा देता है।

41लोक-परलोक दोनों का कर्ता स्वयं परमात्मा है,

42हे रचनहार ! तेरे यश पर कुर्बान जाता हूँ॥३॥

43अपनी महिमा तू ही जानता है।

44तू स्वयं समझता, सुनता और स्वयं बखान करता है।

45वही अनन्य भक्त हैं, जो तुझे अच्छे लगते हैं।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं