सिख धर्म
वापस

गुरु ग्रंथ साहिब 126 · Raag Maajh · Guru Amar Daas Ji

1हे भगवान ! तू स्वयं ही बड़ों से भी बड़ा अर्थात् सर्वश्रेष्ठ है।

2जिस व्यक्ति को तू स्वयं अपना रूप दिखाता है, वहीं तेरे दर्शन कर सकता है।

3हे नानक ! जिसके हृदय में नाम का निवास हो जाता है, फिर प्रभु स्वयं ही उसके हृदय में प्रगट होकर अपने स्वरूप के दर्शन करवा देता है॥८ ॥२६॥२७॥

4माझ महला ३ ॥

5मेरा प्रभु समस्त स्थानों में रहता है।

6गुरु की कृपा से मैंने उसको अपने हृदय घर में ही पा लिया है।

7मैं हमेशा ईश्वर की सेवा करता हूँ और एकाग्रचित होकर उसका ही ध्यान करता हूँ। गुरु के द्वारा मैं सत्यस्वरूप परमात्मा में लीन हो गया हूँ॥१॥

8मैं तन-मन से उन पर कुर्बान हूँ जो अपने मन में जगजीवन को बसाते हैं।

9भगवान जगत् का जीवन, निर्भीक एवं दाता है। गुरु की मति द्वारा जीव सहज ही उसमें समा जाता है॥१॥ रहाउ ॥

10धरती, धवल एवं पाताल-यह सबकुछ मानव के शरीर रूपी घर में ही हैं।

11मेरा नित-नवीन प्रियतम परमेश्वर भी शरीर रूपी घर में ही रहता है।

12सुखदाता प्रभु सदैव ही आनंदपूर्वक रहता है और गुरु की मति द्वारा मनुष्य सहज ही उसमें समा जाता है॥२ ॥

13जब तक काया के भीतर अहंकार एवं ममत्व है,

14तब तक जन्म-मरण का चक्र समाप्त नहीं होता।

15जो प्राणी गुरमुख बन जाता है, वह अपने अहंकार को निवृत्त कर लेता है और परम सत्य प्रभु का ध्यान करता है॥३॥

16पाप एवं पुण्य दोनों भाई शरीर में ही रहते हैं।

17इन दोनों ने मिलकर सृष्टि को पैदा किया है

18जो व्यक्ति इन दोनों का वध करके आत्म-स्वरूप में निवास कर लेता है, वह गुरु की मति द्वारा सहज ही समाया रहता है।॥४॥

19मोह-माया में फँसने के कारण मनुष्य के हृदय-घर में अज्ञानता का अँधेरा बना रहता है।

20यदि वह अहंत्व एवं ममत्व की भावना को त्याग दे तो उसके ह्रदय में प्रभु-ज्योति का प्रकाश हो जाता है।

21जब सुखदाता अनहद शब्द मन में प्रगट हो जाता है तो मनुष्य प्रतिदिन नाम का ध्यान करता रहता है।॥५॥

22जिस परमात्मा ने जगत् को प्रगट किया है, समस्त जीवों में उसकी ही ज्योति विद्यमान है।

23मनुष्य का अज्ञानता का अँधेरा गुरु की शिक्षा से मिट जाता है और

24उसका हृदय कमल प्रफुल्लित हो जाता है। फिर मनुष्य की ज्योति परम-ज्योति प्रभु में विलीन हो जाती है॥६॥

25भगवान के आत्म-स्वरूप रूपी महल में नाम रूपी रत्न के भण्डार भरे हुए हैं

26परन्तु मनुष्य अनंत प्रभु के नाम को गुरु के माध्यम से ही प्राप्त करता है।

27जीव रूपी व्यापारी हमेशा ही गुरु के माध्यम से नाम का व्यापार करता है और हमेशा ही नाम रूपी लाभ प्राप्त करता है॥७ ॥

28भगवान स्वयं ही अपने आत्म-स्वरूप रूपी महल में नाम-वस्तु को रखता है और स्वयं यह नाम-वस्तु गुरु के माध्यम से जीवों को देता है।

29कोई विरला पुरुष गुरु के माध्यम से ही यह व्यापार करता है।

30हे नानक ! परमेश्वर जिस पर अपनी कृपा-दृष्टि करता है, वहीं नाम को प्राप्त करता है। परमेश्वर अपनी कृपा करके नाम को उसके हृदय में बसा देता है॥८ ॥२७॥२८॥

31माझ महला ३ ॥

32भगवान स्वयं ही जीव को अपने साथ मिलाता है और उससे अपनी सेवा करवाता है।

33फिर गुरु के शब्द द्वारा माया का प्रेम जीव के मन से दूर हो जाता है।

34भगवान निर्मल है और सदैव ही गुणों का दाता है। भगवान स्वयं ही जीव को अपने गुणों में लीन करता है॥१॥

35मैं कुर्बान हूँ और मेरा जीवन भी उन पर कुर्बान है जो परम सत्य परमात्मा को अपने अन्तर्मन में बसाते हैं।

36सत्य नाम हमेशा ही निर्मल है। इस निर्मल नाम को जीव गुरु के शब्द द्वारा अपने मन में बसा लेता है॥१॥ रहाउ ॥

37भगवान स्वयं ही जीवों को नाम की देन देने वाला गुरु है और स्वयं ही जीवों के कर्मो का भाग्यविधाता है।

38भगवान के सेवक उसकी सेवा करते हैं और गुरु के माध्यम से वह भगवान को पहचान लेते हैं।

39जो व्यक्ति हमेशा ही नाम-अमृत का पान करते रहते हैं वह सुन्दर बन जाते हैं। वह गुरु की मति द्वारा हरि-रस को प्राप्त कर लेते हैं।॥२॥

40इस शरीर रूपी गुफा में आत्मस्वरूप रूपी एक अत्यंत सुन्दर स्थान है।

41पूर्ण गुरु ने जिनका अहंकार नाश कर दिया है,

42वे रात-दिन प्रेमपूर्वक मग्न होकर नाम की सराहना करते रहते हैं। ऐसे लोगों को गुरु की कृपा से ही नाम प्राप्त होता है॥३॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं