सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 1268 · Raag Malaar · Guru Arjan Dev Ji

1कोमल स्वभाव, दासी की तरहस्त्री अपने पति के बिना शोभा प्राप्त नहीं करती॥१॥

2जब ठाकुर जी ने मेरी विनती सुनी तो कृपा करके आ गया।

3हे नानक ! मेरा पति प्रभु सुहाग बन गया है, अब शोभा, आचरण, प्रतिष्ठा सब् भले हैं॥२॥३॥७॥

4मलार महला ५ ॥

5प्रियतमप्रभु के सच्चे नाम का ही चिंतन किया है।

6जब गुरु की मूर्ति को मन में बसाया तो संसार-सागर के दुख-दर्द नष्ट हो गए॥१॥रहाउ॥

7जब मैं भगवान की शरण में आया तो दुश्मनों का अंत हुआ और सब पापी दुखों में लीन हो गए।

8बचाने वाले प्रभु ने हाथ देकर मुझे बचाया है और नाम पदार्थ ही प्राप्त हुआ है॥१॥

9उसने कृपा करके मेरे सब पाप काट दिए हैं और निर्मल नाम मन को दे दिया है।

10नानक फुरमाते हैं कि गुणों का भण्डार प्रभु मन में अवस्थित हो गया है, अतः पुनः कोई दुख नहीं सताता ॥२॥४॥८॥

11मलार महला ५ ॥

12हे मेरे प्रियतम प्रभु ! तू प्राणों से भी प्यारा है।

13दयालु कृपालु होकर मुझे अपनी प्रेम भक्ति एवं नाम ही दीजिए॥१॥रहाउ॥

14हे प्रियतम ! मैं तुम्हारे चरणों का स्मरण करता हूँ और हृदय में तुम्हारी ही आशा है।

15मैं संतजनों के पास विनती करता हूँ कि मेरे मन में दर्शनों की ही तीव्र लालसा है॥१॥

16हे प्रभु ! तुझसे बिछुड़ना मरने के बराबर है, तेरा मिलन ही एकमात्र जीवन है, दास को दर्शन दीजिए।

17नानक प्रार्थना करते हैं कि हे प्रभु ! तेरा नाम ही जीवन का आसरा एवं धन है, मुझ पर कृपा करो॥२॥५॥६॥

18मलार महला ५ ॥

19अब अपने प्रियतम प्रभु के संग मेरी प्रीति लगी हुई है।

20राजा राम का मनन करते हुए परम सुख प्राप्त हुआ है और गुरु ने सुखों की बरसात की है॥१॥रहाउ॥

21सुखसागर परमेश्वर एक पल भी नहीं भूलता और नामोच्चारण से नवनिधि प्राप्त हुई है।

22हमारा भाग्योदय हुआ तो सहायक संतों से भेंट हो गई।॥१॥

23परब्रह्म में लगन लगाई तो सुख उत्पन्न हो गए और सब दुख समाप्त हो गए।

24हे नानक ! हरि-चरणों का ध्यान किया तो कठिन एवं भयानक संसार-सागर पार कर लिया॥२॥६॥१०॥

25मलार महला ५ ॥

26गुरु ने ज्ञान एवं उपदेश की वर्षा करके पूरे जगत को छाया दे दी है।

27मेरा प्रियतम प्रभु कृपालु हुआ तो आनंद एवं मंगल सुख प्राप्त हो गया॥१॥रहाउ॥

28परब्रह्म का मन में ध्यान करने से सब क्लेश मिट गए हैं और तृष्णा बुझ गई है।

29साधु पुरुषों की संगत में जन्म-मरण का निवारण हुआ है, अब इधर-उधर नहीं भटकता॥१॥

30यह मन तन परमात्मा के पावन नाम में ही लीन है और उसी के चरण-कमल में लगन लगाई हुई है।

31नानक का कथन है कि प्रभु ने अपने साथ मिलाकर दास को शरण में ले लिया है॥२॥७॥११॥

32मलार महला ५ ॥

33हे परब्रह्म ! तुझसे बिछुड़कर यह जीवन कैसे जीया जा सकता है?

34तेरे मिलन की आशा में मन में उत्साह बना हुआ है और तेरे चरण-कमल का रस पीना चाहता हूँ॥१॥रहाउ॥

35हे मेरे प्रियतम ! जिनको तेरे दर्शनों की तीव्र लालसा हैं, उनको कोई भेदभाव नहीं होता।

36जिनको मेरा प्यारा राम भूल जाता है, वे मरते ही रहते हैं।॥१॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं