सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 1266 · Raag Malaar · Guru Raam Daas Ji

1हम परमात्मा के गुण गाते हैं, उसके नाम का उच्चारण करते हैं और द्वैतभाव का प्रेम हमने त्याग दिया है॥१॥

2एकमात्र वही मेरा मनमोहन एवं प्रियतम और वही परमानंद एवं वैराग्यवान है।

3हे नानक ! परमात्मा के दर्शन ही हमारा जीवन है, एक के लिए दर्शन मिल जाए॥२॥२॥६॥६॥१३॥६॥३१॥

4रागु मलार महला ५ चउपदे घरु १

5ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

6हे जीव ! तू क्या सोचता है, क्या याद करता है, तू कौन-सा उपाय आजमा रहा है।

7जिसकी परमात्मा सहायता करने वाला है, उसे तो तनिक भी किसी की परवाह नहीं होती॥१॥

8हे सत्संगी सखी ! खुशी के बादल बरस रहे हैं, घर में पति-प्रभु आ गया है।

9मैं दीन कृपानिधान, नवनिधि-प्रदाता प्रभु के नाम में विलीन हूँ॥१॥रहाउ॥

10हमने अनेक प्रकार के भोजन, विभिन्न व्यंजन एवं मिठाइयाँ तैयार की हैं।

11रसोई को पावन एवं शुद्ध किया है, हे प्रभु ! भोग-प्रसाद ग्रहण कीजिए॥२॥

12इस हृदय-घर को प्रभु ने अपनाया तो दुष्ट विकारों का नाश हो गया और गुण रूपी सज्जन खुशी से खिल उठे।

13जब रंगीला प्रभु हृदय घर में आया तो मुझे सर्व सुख प्राप्त हुए॥३॥

14विधाता ने भाग्य में लिखा हुआ था, इसी कारण संतों की सभा एवं पूर्ण गुरु का आसरा प्राप्त हुआ।

15नानक का कथन है कि रंगीले प्रभु को पाकर अब पुनः कोई दुख-दर्द नहीं लगता॥४॥१॥

16मलार महला ५ ॥

17जब छोटा-सा बच्चा दूध के आसरे होता है तो दूध के बिना वह बिल्कुल नहीं रहता।

18देखभाल करने वाली माता जब मुँह में दूध देती है तो वह तृप्त हो जाता है॥१॥

19हे दाता प्रभु ! हम तेरे बच्चे हैं और तू हमारा पिता है।

20यदि बालक लाखों बार गलती करता है तो पिता के सिवा उसका अन्य कोई ठौर-ठिकाना नहीं होता॥१॥रहाउ॥

21बेचारे बालक की बुद्धि इतनी चंचल होती है कि वह सांप एवं अग्नि दोनों को हाथ लगाता है।

22जब माता-पिता उसे गले से लगाकर रखते हैं, तब वह आनंद एवं खुशी में खेलता है॥२॥

23हे मेरे स्वामी ! जिसका तू पिता है, उस बालक को भला कैसी भूख होगी।

24नवनिधि एवं सुखों का भण्डार नाम तेरे घर में है।जैसी मनोकामना होती है, वही मिलता है॥३॥

25कृपालु पिता ने यह आज्ञा कर दी है कि बालक मुख से जो मांगता है, उसे दे देना।

26हे नानक ! यह बालक प्रभु दर्शन ही चाहता है और कामना करता है कि मेरे हृदय में सदैव प्रभु के चरण बसे रहें॥४॥२॥

27मलार महला ५ ॥

28सभी तरीकों का चिन्तन करके हमने सब भ्रमों को त्याग देने का कार्य किया है।

29मालिक पर भरोसा करके घर में भक्ति का कार्य आरम्भ किया है॥१॥

30संगीत की सुखमय ध्वनियां सुनाई दे रही हैं।

31ज्ञान की सुबह हो गई है, मुझे प्रभु के दर्शन प्राप्त हुए हैं और घर में खुशियों का मंगलगान हो रहा है॥१॥रहाउ॥

32मन लगाकर सभी स्थानों को सुन्दर बनाया है और संतों से जाकर पूछती हूँ कि प्रभु कहाँ है।

33खोजते-खोजते मुझे पति-परमेश्वर मिल गया है और उसके पैरों में झुककर उसकी भक्ति करती हूँ॥२॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं