गुरु ग्रंथ साहिब 1265 · Raag Malaar · Guru Raam Daas Ji
1नानक पर प्रभु ने कृपा धारण की है और विषय-विकारों में डूब रहे को बाहर निकाल लिया है॥४॥६॥
2मलार महला ४ ॥
3जो गुरु की कृपा से हरिनाम-अमृत का पान नहीं करते, उनकी तृष्णा एवं भूख दूर नहीं होती।
4मन की मर्जी करने वाले हठधर्मी मूर्ख लोग अहंकार में जलते हैं और अहम्-भाव में दुख ही प्राप्त करते हैं।
5आवागमन में उनका जीवन व्यर्थ जाता है और दुखों में लीन होकर पछताते हैं।
6जिस परमेश्वर से उत्पन्न होते हैं, उसको याद नहीं करते, उनके जीवन एवं खान-पान को धिक्कार है॥१॥
7हे प्राणी ! गुरमुख बनकर हरिनाम का भजन करो,
8जब प्रभु कृपा करता है तो गुरु से मिला देता है, तदन्तर जीव हरिनाम स्मरण में लीन रहता है।॥१॥रहाउ॥
9स्वेच्छाचारी का जीवन व्यर्थ हो जाता है और जन्म-मरण के चक्र में लज्जित होता है।
10वह अभिमानी बनकर काम-क्रोध में डूबता है और अहम् में जलता रहता है।
11उसके पास न गुणसंपन्नता होती है, न सद्बुद्धि होती है, वह मंदमति के कारण लोभ की लहरों में पड़कर दुख ही पाता है।
12गुरु से विहीन रहकर वे महादुख पाते हैं, जब मौत पकड़ती है तो चिल्लाते हैं।॥२॥
13प्रभु का अगोचर नाम गुरु के कोमल शांत-स्वभाव से प्राप्त होता है।
14तदन्तर हरिनाम रूपी सुखों का भण्डार अन्तर्मन में अवस्थित हो जाता है और जिव्हा प्रभु का गुणगान करती है।
15वह एक प्रभु-शब्द की लगन में दिन-रात आनंदित रहता है।
16यह सच्चे गुरु का बड़प्पन है कि हरिनाम रूपी पदार्थ नैसर्गिक ही प्राप्त होता है।॥३॥
17सतगुरु से प्रभु मन में अवस्थित हुआ है, इसलिए सतगुरु पर मैं सदैव कुर्बान जाता हूँ।
18मैं मन-तन सर्वस्व उसके आगे अर्पण करता हूँ और गुरु चरणों में दिल लगा लिया है।
19अपनी कृपा करके पूर्ण गुरु स्वयं ही मिला लेता है।
20हे नानक ! हम लोहे के समान है, गुरु नैया एवं जहाज है, जिसके संग संसार-सागर से पार उतर जाते हैं।॥४॥७॥
21मलार महला ४ पड़ताल घरु ३
22ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
23भक्तजन श्री राम नाम का उच्चारण करते हैं, साधुसंगत में मिल बैठकर वे प्रभु का भजनगान करते हैं।॥१॥रहाउ॥
24हरिनाम धन का व्यापार करो, इसी धन को संचित करो, इस धन को चोर भी चोरी नहीं करते॥१॥
25बादलों की गूंज सुनकर मोर एवं चातक दिन-रात बोलते हैं।॥२॥
26वैसे ही जो हिरन, मछलियाँ एवं पक्षी बोलते हैं, वे भी प्रभु के बिना किसी अन्य का जाप नहीं करते॥३॥
27नानक का कथन है कि जिन भक्तों ने ईश्वर का कीर्ति-गान किया है, उनका यम का भय छूट गया है॥४॥१॥८॥
28मलार महला ४ ॥
29राम राम बोलते भाग्यशाली व्यक्ति उसी को खोजते हैं।
30यदि कोई मुझे परमात्मा का मार्ग बता दे तो मैं उसी के पांवों में लगा रहूँ॥१॥रहाउ॥
31परमात्मा हमारा मित्र एवं शुभचिन्तक है और उसी से हमारी प्रीति लगी हुई है।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं