सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 1264 · Raag Malaar · Guru Raam Daas Ji

1हे मेरे भाई ! गुरु के शिष्यो, हरि का नामोच्चारण करो, यही भयानक संसार-सागर से तैराता है॥१॥रहाउ॥

2जो व्यक्ति गुरु की पूजा एवं सेवा करता है, वही मेरे प्रभु को प्रिय लगता है।

3ईश्वर की उपासना करो, सबसे पहले सच्चे गुरु का पूजन करो, वह कृपा करके स्वयं संसार-सागर से तिरा देता है॥२॥

4भ्रम में भूला हुआ अज्ञानांध अज्ञानी जीव मूर्तियों पर फूल भेंट करता है।

5वह पत्थर की मूर्तियों की पूजा-अर्चना करता है, समाधियों पर शीश निवाता है और अपनी मेहनत व्यर्थ गंवा देता है॥३॥

6जो ब्रह्म को जानता है, वही सच्चा गुरु कहलाता है और हरि की कथा सुनाता है।

7उस गुरु को अनेक प्रकार के भोजन, सुन्दर वस्त्र इत्यादि सर्वस्व अर्पण करो, उसे सत्य मानकर उसकी शिक्षाओं को ग्रहण करो, उस पुण्य से पुनः कोई कमी नहीं आएगी॥४॥

8सच्चा गुरु साक्षात् परमात्मा की मूर्ति है, जो जिज्ञासुओं को अमृत वचन सुनाता है।

9हे नानक ! उसी व्यक्ति के अहोभाग्य हैं, जो परमात्मा के चरणों में मन लगाता है॥५॥४॥

10मलार महला ४ ॥

11जिनके हृदय में मेरा सतिगुरु बस गया है, वे संत पुरुष हर प्रकार से उत्तम एवं भले हैं।

12उनके दर्शनों से मेरा मन खिल उठता है और मैं इन महापुरुषों पर सदा कुर्बान जाता हूँ॥१॥

13उन ज्ञानियों के साथ दिन-रात हरि का नामोच्चारण करो।

14जो गुरु की शिक्षा द्वारा राम नाम रस का आस्वादन लेते हैं, उनकी तृष्णा एवं भूख सब उतर जाती है।॥१॥रहाउ॥

15ईश्वर के भक्त, साधुजन ही सच्चे मित्र हैं, जिनको मिलकर भ्रम-भ्रांति दूर हो जाती है।

16ज्यों हंस जल में से दूध को अलग-अलग कर देता है, वैसे ही साधु-महात्मा जन शरीर में से अभिमान की पीड़ा को निकाल देते हैं।॥२॥

17जिनके मन में परमात्मा का प्रेम नहीं होता, ऐसे कपटी लोग प्रतिदिन कपट करते हैं।

18ऐसे लोगों को भला कोई बुलाकर क्या देगा, क्या खिलाएगा। वे जो भी अच्छा बुरा बोते हैं, वही खाते हैं।॥३॥

19जो ईश्वर का गुण है, वही उसके भक्तों में है और ईश्वर भक्तों में ही स्वयं को स्थिर रखता है।

20समदर्शी गुरु नानक धन्य एवं प्रशंसा के पात्र हैं, जिन्होंने निन्दा एवं स्तुति से मुक्त होकर अन्य लोगों को भी इससे पार कर दिया है॥४॥५॥

21मलार महला ४ ॥

22अपहुँच, मन-वाणी से परे परमात्मा का नाम सर्वोत्तम है और उसकी कृपा से ही नाम का जाप किया है।

23मैं भाग्यशाली हूँ, जो मुझे सच्चे साधु की संगत प्राप्त हुई, साधु की संगत में संसार-सागर से पार हो गया हूँ॥१॥

24मेरे मन में आनंद ही आनंद हो गया है,

25गुरु की कृपा से हरिनाम का जाप किया, जिससे मन का भ्रम एवं भय दूर हो गया॥१॥रहाउ॥

26जिन्होंने परमात्मा का गुणगान किया है, हरिनाम जपा है, हे प्रभु! दया करके उनकी संगत में मिला दो।

27उनके दर्शन से परम-सुख प्राप्त होता है और अहम् एवं दुख का रोग दूर हो जाता है॥२॥

28जो दिन-रात हृदय में हरिनाम का ध्यान करते हैं, उनका पूरा जन्म सफल हो जाता है।

29वे स्वयं तो पार होते ही हैं, सारी दुनिया को भी पार उतार देते हैं, और तो और उनकी समूची वंशावलि भी संसार-सागर से पार हो जाती है।॥३॥

30हे सर्वेश्वर ! समूचा जग तूने स्वयं उत्पन्न किया है और स्वयं ही अपने वश में किया हुआ है।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं