गुरु ग्रंथ साहिब 1263 · Raag Malaar · Guru Raam Daas Ji
1जिसने मेरे प्रभु का नाम भुला दिया है, उसके वंश को कलंक ही लगा है।
2हे हरि ! उस कुल में बच्चे का जन्म नहीं होना चाहिए, वहाँ जन्म देने वाली माँ विधवा ही अच्छी है ताकि बच्चे को जन्म न दे सके॥२॥
3हे परमेश्वर ! मुझे उस सच्चे गुरु से मिला दो, जिसने हृदय में तेरे नाम का ध्यान किया है।
4गुरु का दर्शन करके गुरु का शिष्य यूं खुश होता है, जैसे माता को देखकर बच्चा खुशी से खिल उठता है॥३॥
5जीव-स्त्री एवं पति-प्रभु का एक साथ ही निवास है, परन्तु बीच में अहंकार की कड़ी दीवार है।
6हे नानक ! जब पूर्ण गुरु अहंकार की दीवार को तोड़ देता है तो प्रभु से मिलाप हो जाता है।॥४॥१॥
7मलार महला ४ ॥
8गंगा, यमुना, गोदावरी एवं सरस्वती सरीखी पावन नदियाँ भी साधुओं की चरण-धूलि को पाने का प्रयास करती हैं।
9दरअसल इनका कथन है कि हमारे भीतर पापों की मैल से भरे हुए लोग स्नान करते हैं और हमारी मैल साधु पुरुषों की चरण-धूलि ही समाप्त करती है॥१॥
10हरिनाम अड़सठ तीर्थों के स्नान का फल है।
11जब सत्संगति की धूल उड़कर आँखों में पड़ती है तो दुर्मति की सब मैल दूर हो जाती है।॥१॥रहाउ॥
12राजा भागीरथ कठोर तपस्या करके गंगा को पृथ्वी पर लेकर आए, शिवशंकर ने केदारनाथ की स्थापना की।
13काशी एवं वृंदावन जहाँ श्रीकृष्ण गाएँ चराते रहे, इन सब तीथों ने हरि-भक्तों से ही शोभा प्राप्त की है॥२॥
14जितने भी तीर्थ देवी-देवताओं ने स्थापित किए हैं, सभी साधु-पुरुषों की चरण-धूल की आकांक्षा करते हैं।
15इन तीर्थों का कथन है कि अगर ईश्वर का भक्त, साधु एवं गुरु मिले तो हम उनकी चरण-धूल मुख पर लगा लें॥३॥
16हे मेरे स्वामी ! जितंनी भी तुम्हारी सृष्टि है, सृष्टि के सब लोग साधुओं की चरण-धूल ही चाहते हैं।
17नानक का कथन है कि जिसके मस्तक पर भाग्य लिखा होता है, ईश्वर उसे साधू की चरण-धूल देकर संसार-सागर से मुक्त कर देता है॥४॥२॥
18मलार महला ४ ॥
19जिस पर परमात्मा अपनी कृपा करता है, उसी व्यक्ति को वह अच्छा लगता है।
20जो परमात्मा का स्तुतिगान एवं नामोच्चारण करता है, उसकी हर भूख एवं दुख दूर हो जाता है।॥१॥
21हे मन ! ईश्वर का नाम जपने से ही मुक्ति होती है।
22जो गुरु के वचनों को सुनकर मनन करता है, वह संसार-सागर से पार हो जाता है।॥१॥रहाउ॥
23जिस पर परमात्मा की कृपा है, उस भक्त के लिए हम बाज़ार में बिकने को तैयार हैं।
24हरि-भक्त को मिलकर परम-सुख प्राप्त होता है और वह दुर्मति की सब मैल दूर कर देता है॥२॥
25हरि-भक्त को हरि-भक्ति की लालसा लगी रहती है। जब वह हरेि का कीर्तिगान करता है तो तृप्त हो जाता है।
26हरि का भक्त हरिनाम रूपी जल की मछली की तरह है और हरि को भूलने पर जल बिन मछली की तरह मर जाता है॥३॥
27जिस ईश्वर ने यह प्रेम लगाया है, वही जानता है या जिस व्यक्ति के मन में धारण करता है, उसे ही जानकारी होती है।
28हे नानक ! ऐसा व्यक्ति ईश्वर के दर्शनों से सुख की अनुभूति करता है और उसके तन की तमाम भूख समाप्त हो जाती है॥४॥३॥
29मलार महला ४ ॥
30जितने भी जीव-जन्तु प्रभु ने पैदा किए हैं, सब अपना कर्म लिखवा कर संसार में आते हैं।
31परमात्मा ने अपने भक्तों को कीर्ति प्रदान की है, भक्तजन भक्ति में लीन रहते हैं और सब लोगों को भक्ति में लगाते हैं।॥१॥
32सच्चा गुरु हरि का नाम-सुमिरन (स्मरण) दृढ़ कराता है।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं