गुरु ग्रंथ साहिब 1261 · Raag Malaar · Guru Amar Daas Ji
1इसी तरह हरि-भक्तों का आचरण उत्तम है, जो पूरे जगत में हरि की कीर्ति को फैलाते हैं।॥३॥
2हे मेरे ठाकुर ! मुझ पर कृपा करो, ताकि हरि-नाभ हृदय में धारण कर लूं।
3गुरु नानक का कथन है कि पूर्ण सतगुरु को पाकर मन में ईश्वर का नाम जपता रहता हूँ॥४॥६॥
4मलार महला ३ घरु २
5ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
6यह मन गृहस्थी है या यह उदासी है।
7क्या यह मन वर्ण-जातियों से रहित होकर सदा अविनाशी रहता है।
8क्या मन चंचल है या वैराग्यवान् है।
9जरा यह तो बताओ, इस मन को ममत्व की भावना कहाँ से लगी थी॥१॥
10पण्डित जी ! इस मन का चिन्तन करके सच्ची बात बताओ और
11अन्य बहुत पढ़कर भार मत उठाओ॥१॥रहाउ॥
12यह माया-ममता सृष्टि-कर्ता ने ही लगाई है और
13उसने हुक्म करके सम्पूर्ण सृष्टि उत्पन्न की है।
14हे भाई ! गुरु की कृपा से इस रहस्य को समझ लो और
15सदैव परमात्मा की शरण में रहो॥२॥
16वास्तव में पण्डित तो वही माना जाता है, जो तीन गुणों की गठरी को सिर से उतार देता है और
17दिन-रात एक ईश्वर के नाम की चर्चा करता है।
18वह सच्चे गुरु से दीक्षा लेता है और
19सतगुरु के समक्ष ही शीश अर्पण करता है।
20वह संसार से सदा अलिप्त रहता है,
21ऐसा पण्डित ही परमेश्वर के दरबार में मान्य होता है॥३॥
22सब लोगों में एक ईश्वर की स्तुति करता है।
23वह केवल अद्वैत प्रभु को देखता है और एक को मानता है।
24जिस पर कृपा-दृष्टि करता है, उसे साथ मिला लेता है।
25ऐसा व्यक्ति लोक-परलोक में सदा सुखी रहता है॥४॥
26गुरु नानक कहते हैं कि मुक्ति के लिए कोई कौन-सा तरीका अपनाए।
27दरअसल मुक्ति वही प्राप्त करता है, जिस पर प्रभु-कृपा होती है।
28वह दिन-रात परमात्मा के गुण गाता है और
29शास्त्रों एवं वेदों की पुनः बात नहीं करता॥५॥१॥१०॥
30मलार महला ३ ॥
31भूल-भ्रम में फंसा हुआ स्वेच्छाचारी योनियों में भटकता रहता है।
32यमराज उसे मारता रहता है और वह अपनी इज्जत खो देता है।
33यदि सच्चे गुरु की सेवा की जाए तो मौत का डर दूर हो जाता है और
34हृदय-घर में ही प्रभु मिल जाता है।॥१॥
35हे प्राणी ! गुरु के द्वारा हरि-नाम का मनन करो,
36यह जीवन तू दुविधा में गंवा रहा है, जो कौड़ियों के भाव जा रहा है।॥१॥रहाउ॥
37हे ईश्वर ! कृपा करो. गुरु के द्वारा तुझसे प्रेम लगा रहे।
38मन में ईश्वर की भक्ति धारण करो,
39शब्द-गुरु ही भयानक संसार-समुद्र से पार उतारने वाला है और
40सच्चे द्वार पर जीव सत्यशील दिखाई देता है॥२॥
41मनुष्य अनेक कर्मकाण्ड करता है, पर सतगुरु को नहीं पाता और
42गुरु के बिना धन-दौलत के लिए भ्रम में भूला रहता है।
43वह अपने अहम्, ममत्व एवं मोह में वृद्धि कर लेता है,
44इस कारण द्वैतभाव में स्वेच्छाचारी दुख ही पाता है॥३॥
45ईश्वर ही कर्ता है, वह अगम्य, अथाह है।
46गुरु के उपदेश द्वारा प्रभु का नाम जपने से सच्चा लाभ प्राप्त होता है।
47परमेश्वर बे-परवाह है, हमारे समीप ही है।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं