गुरु ग्रंथ साहिब 1260 · Raag Malaar · Guru Amar Daas Ji
1जीव गुरु के शब्द में लीन रहकर सदा वैराग्यवान रहता है और प्रभु के सच्चे दरबार में यश प्राप्त करता है॥२॥
2हुक्म का बंधा हुआ यह मन अनेक खेल खेलता है और पल में ही दसों दिशाओं में घूम आता है।
3जब सच्चा प्रभु स्वयं करुणा-दृष्टि करता है तो यह मन गुरु के सान्निध्य में तुरंत वश में आ जाता है॥३॥
4शब्द के चिन्तन द्वारा यह सूझ प्राप्त होती है कि मन को वशीभूत करने का तरीका मन ही जानता है।
5नानक का कथन है कि हे भाई ! तू सदैव हरि-नाम का चिंतन कर, जिससे भवसागर से पार हो जाएगा॥४॥६॥
6मलार महला ३ ॥
7यह शरीर, आत्मा एवं प्राण सब ईश्वर की रचना है और वही घट घट में समा रहा है।
8सच्चे गुरु ने यह रहस्य समझा दिया है, इसलिए एक ईश्वर के सिवा मैं अन्य किसी को नहीं मानता॥१॥
9हे मेरे मन ! हरि-नाम में लगन लगाकर रखो, वह अदृष्ट, मन-वाणी से परे, अपरंपार, कर्ता-पुरुष है।
10गुरु के उपदेश से परमात्मा का भजन करो।॥१॥रहाउ॥
11जब प्रभु भक्ति में लगन लगती है तो मन तन भीग उठता है और स्वाभाविक ही उसमें लीन रहता है।
12गुरु की कृपा से भ्रम एवं-भय भाग जाते हैं और एक प्रभु में लगन लगी रहती है॥२॥
13जो गुरु के वचनों से भक्ति का सच्चा कार्य करता है, उसे ज्ञान प्राप्त होता है।
14करोड़ों में से किसी विरले को ही गुरु समझाता है और उसकी राम नाम में लगन लगी रहती है॥३॥
15गुरु की शिक्षा से यह ज्ञान प्राप्त हुआ है, जहाँ देखता हूँ, वहाँ एक प्रभु ही विद्यमान है।
16हे नानक ! अहम्-भाव को दूर कर मैं यह मन, तन, प्राण सर्वस्व प्रभु के आगे अर्पण करता हूँ॥४॥७॥
17मलार महला ३ ॥
18मेरा सच्चा प्रभु दुखों का निवारण करने वाला है, जो शब्द-गुरु द्वारा ही प्राप्त होता है।
19जो प्रभु-भक्ति में लीन होता है, वह सदा वैराग्यवान रहता है और सच्चे दरबार में सम्मान प्राप्त करता है॥१॥
20हे मन ! भगवान की अर्चना में लीन रहो।
21गुरु के द्वारा राम नाम के सुमिरन (स्मरण) से मन प्रसन्न हो जाता है और प्रभु में लौ लगी रहती है।॥१॥रहाउ॥
22मेरा प्रभु अपहुँच, मन-वाणी से परे है, गुरु की शिक्षा यह भेद बताती है।
23सत्य, संयम, शुभ कर्म करो, ईश्वर का कीर्तिगान करो और उसकी लगन में लीन रहो॥२॥
24ईश्वर ही शब्द है, सत्य रूप में साक्षी है, जिसने अपनी ज्योति हमारी ज्योति में मिलाई हुई है।
25यह शरीर नाशवान् है, इसमें प्राणों का संचार चल रहा है और गुरु से ही नाम अमृत प्राप्त होता है॥३॥
26परमात्मा स्वयं ही संसार बनाकर लोगों को काम-धंधे में लगाता है और वह परम-सत्य सर्वव्याप्त है।
27हे नानक ! हरि-नाम के सिवा कोई कुछ नहीं और नाम-स्मरण से जीव को बड़ाई प्रदान करता है॥४॥८॥
28मलार महला ३ ॥
29अहम् के जहर ने मन को मोहित किया हुआ था और अजगर जैसा पापों का भारी बोझ लादा हुआ था।
30जब गुरु ने गारुड़ी मंत्र सरीखा शब्द मुँह में डाला तो ईश्वर ने अहम् के जहर को खत्म कर दिया॥१॥
31हे मन ! अहम् एवं मोह का दुख बहुत भारी है।
32इस संसार-सागर से पार नहीं हुआ जा सकता, पर गुरु ही इससे पार करवाता है॥१॥रहाउ॥
33समूचे संसार में त्रिगुण माया का मोह फैला हुआ है।
34तुरीयावस्था सत्संगत में प्राप्त होती है और उसकी कृपा से जीव संसार-सागर से पार उतर जाता है।॥२॥
35ज्यों चन्दन की सुगन्ध श्रेष्ठ है, जो सब ओर अपनी महक फैला देती है।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं