सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 125 · Raag Maajh · Guru Amar Daas Ji

1गुरमुख का जीना एवं मरना प्रमाणिक है।

2उसका जीवन व्यर्थ नहीं जाता, क्योंकि वह परमात्मा को पहचानता है।

3गुरमुख मरता नहीं और न ही उसको मृत्यु निगलती है। गुरमुख सत्य में लीन रहता है। २॥

4ऐसे गुरमुख ईश्वर के दरबार में बड़ी शोभा पाते हैं।

5गुरमुख अपने मन में से अहंकार को मिटा देता है।

6गुरमुख स्वयं भवसागर से पार हो जाता है और अपने समूचे वंश को भी पार कर लेता है और अपना जीवन संवार लेता है॥३॥

7गुरमुख के शरीर को कभी कोई दुःख नहीं लगता।

8गुरमुख के अहंकार की वेदना-पीड़ा दूर हो जाती है।

9गुरमुख का मन अहंत्व को मैल से निर्मल हो जाता है और उसे फिर अहंत्व की मैल नहीं लगती। गुरमुख सहज ही समाया रहता है॥४॥

10गुरमुख ईश्वर के नाम की महानता प्राप्त करता है।

11गुरमुख भगवान का गुणानुवाद करता है और दुनिया में बड़ी शोभा प्राप्त करता है।

12वह सदैव ही दिन-रात आनंदपूर्वक रहता है। गुरमुख भगवान के नाम की ही साधना करता है॥५॥

13गुरमुख रात-दिन शब्द में मग्न रहता है।

14गुरमुख चारों युगों में जाना जाता है।

15गुरमुख सदा निर्मल प्रभु का यशोगान करता है और शब्द द्वारा भगवान की भक्ति करता रहता है।॥६॥

16गुरु के बिना घनघोर अंधकार है।

17यमदूत द्वारा जकड़े हुए मनुष्य जोर-जोर से चिल्लाते हैं।

18वह रात-दिन रोगी बने रहते हैं, जैसे विष्टा के कीड़े विष्टा में दुखी होते रहते हैं।॥७॥

19गुरमुख स्वयं ही भगवान की भक्ति करते एवं अन्यों से भी करवाते हैं।

20गुरमुख के हृदय में परमेश्वर स्वयं आकर निवास कर लेता है।

21हे नानक ! प्रभु के नाम से महानता प्राप्त होती है। पूर्ण गुरु द्वारा ही नाम पाया जाता है॥८॥२५॥२६॥

22माझ महला ३ ॥

23समस्त शरीरों में जो ज्योति विद्यमान है, वह ज्योति एक ही है अर्थात् एक ईश्वर की ज्योति सब में विद्यमान है।

24पूर्ण सतिगुरु शब्द द्वारा मनुष्य को इस ज्योति के दर्शन करवा देते हैं।

25विभिन्न शरीरों में ईश्वर ने स्वयं ही विविधता उत्पन्न की है और स्वयं ही जीवों के शरीर की रचना की है॥१॥

26मैं उन पर तन-मन से कुर्बान हूँ जो सत्यस्वरूप परमेश्वर का गुणगान करते हैं।

27गुरु के अलावा किसी को भी सहज प्राप्त नहीं होता। गुरमुख सहज ही समाया रहता है॥१॥ रहाउ॥

28हे प्रभु ! तू स्वयं ही सर्वत्र सुन्दर रूप में शोभा दे रहा है और स्वयं ही जगत् को मोहित कर रहा है।

29तूने स्वयं ही अपनी कृपा-दृष्टि से समूचे जगत् को मोह-माया में पिरोया हुआ है।

30हे मेरे हरि-परमेश्वर ! तुम स्वयं ही दुख और सुख प्रदान करते हो और गुरमुखों को हरि-दर्शन करवाते हो ॥२ ॥

31जगत् का रचयिता प्रभु स्वयं ही सब कुछ करता और जीवों से करवाता है।

32वह स्वयं गुरु का शब्द मनुष्य के हृदय में बसाता है।

33शब्द से अमृत-वाणी उत्पन्न होती है। गुरमुख इस अमृत-वाणी को बोलकर दूसरों को सुनाते हैं।॥३॥

34हरि-प्रभु स्वयं ही कर्ता और स्वयं ही जगत् के पदार्थों को भोगने वाला है।

35भगवान जिस व्यक्ति के बन्धनों को तोड़ देता है, वह हमेशा के लिए मुक्त हो जाता है।

36सत्य स्वरूप परमेश्वर स्वयं भी माया के बन्धनों से हमेशा के लिए मुक्त है। वह अलक्ष्य परमेश्वर स्वयं ही अपने स्वरूप के दर्शन करवाता है॥४॥

37परमेश्वर स्वयं ही माया है और स्वयं ही उस माया में प्रतिबिम्बित है।

38उस प्रभु ने स्वयं ही माया के मोह को पैदा किया है और स्वयं ही जगत् की रचना की है।

39परमेश्वर स्वयं ही गुणदाता और वह स्वयं ही अपने गुण गा रहा है। वह स्वयं ही अपने गुण बोलकर सुना रहा है॥५॥

40प्रभु स्वयं प्राणियों का कर्ता है और उनसे कर्म करवाता है।

41परमात्मा स्वयं ही सृष्टि-रचना करता है और स्वयं ही सृष्टि का विनाश भी करता है।

42हे प्रभु ! तेरे हुक्म के बिना कुछ भी नहीं हो सकता। तुमने स्वयं ही प्राणियों को विभिन्न कर्मों में लगाया हुआ है॥६॥

43भगवान स्वयं ही जीवों को मारता है और स्वयं ही उन्हें जीवित भी रखता है।

44वह स्वयं ही जीवों को गुरु से मिलाता है और उन्हें गुरु के सम्पर्क में रखकर अपने साथ मिला लेता है।

45गुरु की सेवा करने से मनुष्य को सदैव ही सुख प्राप्त होता है और गुरु की प्रेरणा से जीव सहज ही सत्य में समा जाता है॥७॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं