सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 1259 · Raag Malaar · Guru Amar Daas Ji

1जीवन देकर उसने तृप्त किया है, अतः सच्चे नाम में समाहित रहते हैं।

2जिनके दिल में नित्य परमेश्वर लीन रहता है, वे सहज समाधि लगाते हैं।॥२॥

3सच्चे गुरु के उपदेश ने यह मन प्रभु में लीन कर दिया है और हृदय में शुद्ध वाणी ही है।

4मेरा प्रभु अदृष्ट है, उसे देखा नहीं जा सकता, उसकी अकथ कहानी गुरु ने कथन की है।

5वह सुखदाता जब दया करता है तो प्रभु नाम का जाप होता है॥३॥

6गुरु के द्वारा स्वाभाविक ईश्वर का ध्यान होता है और पुनः आवागमन नहीं होता।

7मन से ही मन स्वामी में मिल जाता है और मन प्रभु में लीन हो जाता है।

8अहम्-भावना को दूर करके सत्यशील सत्य में विश्वस्त होते हैं।॥४॥

9एक प्रभु ही मन में बसता है, दूसरा अन्य कोई नहीं।

10केवल हरि-नाम ही अमृत की तरह मीठा है और यही सत्य दुनिया में निर्मल है।

11हे नानक ! प्रभु का नाम वही प्राप्त करता है, जिसके भाग्य में लिखा होता है॥५॥४॥

12मलार महला ३ ॥

13गुरु के उपदेश का चिंतन कर हरि-नाम जपते हुए गण-गंधर्व सबका उद्धार हो गया।

14अहम् को मारकर उन्होंने परमात्मा को सदा के लिए मन में बसा लिया है।

15जिसे वह सच्चाई समझाता है, वही समझता है, जिसे स्वयं ही अपने साथ मिला लेता है।

16वह दिन-रात वाणी से प्रभु शब्द का गान करता है और सच्चे की लगन में लीन रहता है।॥१॥

17हे मेरे मन ! हर पल हरि-नाम स्मरण करो।

18गुरु का प्रदान किया शब्द मन को सदैव सुख देने वाला है और यह सदा साथ निभाता है॥१॥रहाउ॥

19स्वेच्छाचारी का पाखण्ड कभी दूर नहीं होता और वह द्वैतभाव में दुख ही पाता है।

20उसका मन प्रभु के नाम को भुलाकर विषय-विकारों में लीन रहता है, जिस कारण वह अपना जीवन व्यर्थ ही गंवा देता है।

21प्रभु-स्मरण के लिए यह जीवन पुनः प्राप्त नहीं होता और सदा पछताता है।

22वह मर-मरकर जन्मता है, कभी तथ्य को नहीं बूझता और विष्ठा में ही लीन रहता है।॥२॥

23गुरु के उपदेश का मनन करके गुरमुख हरि-नाम में ही लीन रहते हैं और उनका उद्धार हो जाता है।

24वे परमात्मा को मन में बसाकर उसका ध्यान करते हैं और जीवन्मुक्त हो जाते हैं।

25उनका मन तन निर्मल हो जाता है, बुद्धि भी निर्मल हो जाती है और उत्तम वचन ही बोलते हैं।

26वे एक परमपुरुष प्रभु को जानते हैं और अन्य कोई नहीं॥३॥

27प्रभु स्वयं ही करता और करवाता है और स्वयं ही कृपा करता है।

28उनका मन तन गुरु की वाणी में लीन रहता है और सुरति सेवा में समाई रहती है।

29वह अदृष्ट एवं रहस्यातीत प्रभु मन में बसा हुआ है, पर जो गुरमुख होता है, उसे ही दर्शन देता है।

30नानक फुरमाते हैं कि जैसा ईश्वर को उपयुक्त लगता है, उसे वह स्वयं ही (नाम-दर्शन) देता है और अपनी मर्जी से ही सबको चलाता है॥४॥५॥

31मलार महला ३ दुतुके ॥

32सच्चे गुरु से ही परमात्मा का घर-द्वार, महल, सुन्दर स्थान प्राप्त होता है।

33गुरु के उपदेश से अभिमान समाप्त हो जाता है॥१॥

34विधाता के विधानानुसार जिसके भाग्य में हरि-नाम लिखा होता है,

35वह सदा परमेश्वर का भजन करता है और सच्चे दरबार में सम्मान प्राप्त करता हैI॥१॥रहाउ॥

36जब मनुष्य सच्चे गुरु से मन को वशीभूत करने की विधि जान लेता है तो प्रभु ध्यान में ही लीन रहता है।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं