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गुरु ग्रंथ साहिब 1258 · Raag Malaar · Guru Amar Daas Ji

1जिस परमेश्वर से उत्पन्न होता है, उसी में विलीन हो जाता है और सारा प्रसार खत्म हो जाता है॥४॥१॥

2मलार महला ३ ॥

3जिसने मालिक के हुक्म को पहचान लिया है, वह शब्द द्वारा अहम् को जलाकर सत्य में ही मिल गया है।

4वह दिन-रात सच्ची भक्ति करता है और परम-सत्य प्रभु के ध्यान में लीन रहता है।

5गुरु के उपदेश से उसे स्वाभाविक सब ओर सदैव सत्य प्रभु ही दृष्टिगत होता है।॥१॥

6हे मन ! परमात्मा का हुक्म मानने से ही सुख प्राप्त होता है।

7प्रभु को अपनी रज़ा मानने वाला ही पसंद है, जिसे कृपा कर समर्था प्रदान करता है, उसे कोई बाधा नहीं आती॥१॥रहाउ॥

8तीन गुणों में भटकन ही है, इससे न ईश्वर की भक्ति होती है, न ही प्रेम होता है।

9जीव अहम्-भाव में कर्म करता है और कभी मुक्ति प्राप्त नहीं होती।

10जो मालिक को मंजूर है, वही होता है और पथभ्रष्ट जीव कर्मों के बन्धन में पड़ा रहता है।॥२॥

11जब सतगुरु से संपर्क होता है, तो मन की वासनाएँ दूर हो जाती हैं और प्रभु का नाम मन में अवस्थित हो जाता है।

12उसकी महत्ता का वर्णन नहीं किया जा सकता और न ही कीर्ति बताई जा सकती है।

13वह तुरीयावस्था में स्थित होकर परम-सत्य में लीन रहता है।॥३॥

14मेरा प्रभु मन-वाणी से परे है, उसकी महिमा का वर्णन नहीं किया जा सकता।

15यदि गुरु की कृपा से शब्द द्वारा अभ्यास किया जाए तो उसका भेद समझा जा सकता है।

16गुरु नानक का कथन है कि हरिनाम का स्तुतिगान करो, इसी से सच्चे द्वार पर शोभा प्राप्त होती ॥४॥२॥

17मलार महला ३ ॥

18जिस पर परमेश्वर कृपा करता है, कोई विरला गुरमुख ही तथ्य को बुझता है।

19गुरु के बिना दाता कोई नहीं और कृपा करके केवल वही नाम प्रदान करता है।

20गुरु को मिलकर शान्ति उत्पन्न होती है और जीव प्रतिदिन हरिनाम जपता रहता है॥१॥

21हे मेरे मन ! हरिनामामृत का चिन्तन कर।

22सच्चे गुरु के मिलने पर ही हरिनाम प्राप्त होता है और जीव हरिनाम में ही विलीन रहता है॥१॥रहाउ॥

23मनमुखी परमात्मा से बिछुड़ कर आवागमन में भटकता है, न कोई उसके पास गुण होता है, न ही उसका कोई साथ देता है।

24अहम् बहुत बड़ा रोग है और यमराज पटक कर मारता है।

25जो गुरु की शिक्षानुसार चलता है, अच्छी संगत में रहता है, नित्य हरिनाम जपता है, वह ईश्वर से नहीं बिछुड़ता॥२॥

26हे ईश्वर ! केवल तू ही सबका रचयिता है और नित्य विचार कर देखभाल करता है।

27किसी गुरमुख को भक्ति का भण्डार प्रदान कर स्वयं ही मिला लेता है।

28तू स्वयं सब कुछ जानता है, तेरे सिवा किसके समक्ष प्रार्थना की जाए॥३॥

29परमात्मा का नाम अमृत के समान है और उसकी करुणा-दृष्टि से प्राप्त होता है।

30कोई जिज्ञासु गुरु के शांत-स्वभाव में दिन-रात हरि का नामोच्चारण करता है।

31हे नानक ! हरि का नाम सुखों का भण्डार है, अतः नाम-स्मरण में ही मन लगाना चाहिए॥४॥३॥

32मलार महला ३ ॥

33गुरु की प्रशंसा करो, वह सदा सुख देने वाला है और वही नारायण रूप परमेश्वर है।

34जिसने गुरु की कृपा से मोक्ष पाया है, उसकी दुनिया में बहुत कीर्ति हुई है।

35जो प्रतिदिन प्रभु का गुणगान करता है, वह सत्य में समाहित हो जाता है॥१॥

36हे मन ! ह्रदय में गुरु का चिंतन कर।

37झूठे परिवार, तृष्णा एवं अहंकार के जहर को त्याग दे और याद रख मौत अपरिहार्य है॥१॥रहाउ॥

38सच्चा गुरु ही राम नाम का दाता है, अन्य कोई दाता नहीं।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं