गुरु ग्रंथ साहिब 1257 · Raag Malaar · Guru Nanak Dev Ji
1प्रतिदिन ऐसी दवा लो, तेरा शरीर नष्ट नहीं होगा,
2अन्यथा अन्तिम समय यम तुझे मार देगा॥१॥
3हे मूर्ख ! ऐसी दवा का सेवन कर,
4जिसके सेवन से तेरे विकार दूर हो जाएँगे।॥१॥रहाउ॥
5राज्य, माल एवं यौवन सब छाया की तरह हैं और
6सूर्य का चक्र घूमने से सब दिखाई देने लगता है।
7यह शरीर, नाम एवं जाति कुछ भी साथ नहीं जाता।
8वहाँ (परलोक में) दिन और यहाँ (इहलोक) रात होगी॥२॥
9स्वादों को लकड़ियाँ एवं तृष्णा को धी,
10काम क्रोध को तेल बना (ज्ञान) अग्नि में मिलाओ।
11इस आहूति यज्ञ में और पुराणों का पाठ जो भी कर्म है,
12इन में जो प्रभु को उपयुक्त लगता है, वही स्वीकार होता है॥३॥
13तपस्या रूपी कागज पर तेरा नाम-सुमिरन (स्मरण) ही परवान है,
14जिसके भाग्य में लिखा होता है, वह नाम रूपी भण्डार पा लेता है।
15ऐसे धनवान् सच्चे घर में जाते दिखाई देते हैं।
16हे नानक ! उनको जन्म देने वाली माता धन्य है॥४॥३॥८॥
17मलार महला १ ॥
18तेरे कपड़े सफेद हैं, बातें तेरी मीठी हैं,
19नाक लम्बी एवं ऑखें तेरी काली हैं।
20अरी बहिन ! कभी मालिक को देखा है॥१॥
21में उड़-उड़कर आसमान में चढ़ जाऊँ तो हे समर्थ मालिक ! सब तेरी शक्ति से हुआ है,
22पानी, भूमि, पहाड़ों एवं नदियों के तट जहाँ देखता हूँ,
23स्थान-स्थान पर मालिक ही मौजूद है॥२॥
24जिसने शरीर बनाकर साथ श्वास रूपी पंख दिए हैं,
25अत्यंत तृष्णा के कारण उड़ने की चाह लगी रहती है।
26यदि ईश्वर कृपा करे तो धैर्य हो।
27हे भाई ! ज्यों सतगुरु दिखाए त्यों देखू॥३॥
28न यह शरीर साथ जाएगा और न ही श्वास जाएंगे।
29यह तो केवल पवन, पानी एवं अग्नि का नाता था।
30हे नानक ! उत्तम कर्म हो तो गुरु-पीर अपनाकर ईश्वर के नाम का जाप होता है और
31यह शरीर सत्य में विलीन हो जाता है॥४॥४॥६॥
32मलार महला ३ चउपदे घरु १
33ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
34निरंकार ने संसार बनाकर स्वयं ही लोगों को भ्रम में भुलाया हुआ है।
35वह सृष्टि-कर्ता पैदा करके स्वयं ही देखभाल करता है, जैसा चाहता है, उधर ही लगा देता है।
36उसके हुक्म को मानना ही सेवक की बड़ाई है॥१॥
37अपनी रज़ा को वह स्वयं ही जानता है और गुरु की कृपा से ही समझा जाता है।
38इस माया-शक्ति से उलट कर सच्चे घर में आया जाए तो जीते जी विकारों की ओर से रहित रहा जाता है॥१॥रहाउ॥
39वेदों का पाठ-पठन कर पण्डितजन त्रिदेवों के बारे में वाद-विवाद करते हैं (वे कहते हैं) कि ब्रह्म (सृष्टिकर्ता), विष्णु (संसार का पोषक) एवं महेश (संहारक) है।
40यह माया त्रिगुणात्मक है, जिसने पूरे जगत को भुलाया हुआ है, जिस कारण जन्म-मरण का संशय बना हुआ है।
41गुरु की कृपा से जब ईश्वर का बोध हो जाता है तो मन से शंका दूर हो जाती है।॥२॥
42हे प्रभु ! हम दीन, मूर्ख एवं नासमझ हैं, तुम ही हमारी चिंता करो।
43दयालु होकर अपने दासों का दास बना लो, ताकि तेरी सेवा में तल्लीन रहें।
44तुम नाम रूपी निधान प्रदान करो, ताकि दिन-रात तेरे नाम चिंतन में निमग्न रहें।॥३॥
45गुरु नानक कहते हैं कि गुरु की कृपा से इस रहस्य को समझकर कोई मनन कर सकता है।
46ज्यों जल के ऊपर बुलबुला होता है, वैसा ही यह संसार है।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं