गुरु ग्रंथ साहिब 1256 · Raag Malaar · Guru Nanak Dev Ji
1वह दुख-सुख दोनों को समान मानता है और संसार में बुरे-भले को एक दृष्टि से ही देखता है।
2गुरु के प्रेम से सत्संगत में ही ज्ञान, बुद्धि, विवेक तथा हरि-नाम प्राप्त होता है।॥२॥
3दाता गुरु जिसे नाम देता है, वह दिन-रात हरि-नाम प्राप्ति का लाभ पाता है।
4गुरु से वही व्यक्ति शिक्षा प्राप्त करता है, जिस पर ईश्वर करुणा करता है॥३॥
5शरीर रूपी महल परमात्मा का घर है, जिसमें उसकी ज्योति अवस्थित है।
6गुरु नानक फुरमाते हैं कि ईश्वर गुरु के द्वारा ही अपने महल में बुलाता है और मिलाने वाला प्रभु स्वयं ही मिला लेता है॥४॥५॥
7मलार महला १ घरु २
8ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
9पवन-पानी इत्यादि पाँच तत्वों से उत्पत्ति को माना जाता है।
10बेशक शरीर के निर्माण में गर्भ-अग्नि भी भूमिका निभाती है।
11अगर जीव के जन्म लेने वाले मूल स्थान (ईश्वर) को मनुष्य जानता है तो ही
12ज्ञानवान है, उसी का नाम पण्डित कहा जा सकता है।॥१॥
13हे माँ! परमात्मा के गुणों को जाना नहीं जा सकता और
14उसे देखे बिना भी कुछ नहीं कहा जा सकता।
15क्योंकर उसके गुणों की चर्चा की जाए॥१॥रहाउ॥
16ऊपर आसमान, नीचे पाताल और मध्य धरती में परमेश्वर ही स्थित है,
17क्योंकर कहा जाए, विचार दीजिए।
18जीभ के बिना जो हृदय में जपता है, क्या कोई जानता है कि वह कैसे नाम जपता है॥२॥
19कहने-बोलने से परे हो जाता है।
20जिस पर दया करता है, वही बूझता है।
21वह दिन-रात ईश्वर के ध्यान में लीन रहता है,
22वही उत्तम पुरुष है और सत्य में समा जाता है॥३॥
23अगर कोई उत्तम जाति में ईश्वर का सेवक हो जाए,
24मगर ईश्वर की स्तुति न करे तो जीवन बेकार है।
25हे नानक ! अगर कोई छोटी जाति से ईश्वर का सेवक हो तो
26हमारी चमड़ी के जूते भी उसके पाँवों में पहनने के लिए हाजिर हैं॥४॥१॥६॥
27मलार महला १ ॥
28एक दुख किसी से वियोग का है, एक दुख भूख का है।
29एक दुख ताकतवर यमदूतों का है, जो जीव को साथ ले जाते हैं।
30जो शरीर को रोग लग जाता है, एक दुख यह भी है।
31अरे भोले वैद्य ! कोई दवा मत लगाना॥१॥
32हे भोले वैद्य जी ! अपनी दवा का हमारे लिए कोई इस्तेमाल मत करो,
33क्योंकि दर्द होता है तो शरीर में दुख रहता ही है।
34हे भाई ! ऐसी दवा का हम पर कोई असर नहीं होने वाला॥१॥रहाउ॥
35मालिक को भुलाकर जब रस एवं भोगों का आनंद प्राप्त किया
36तो शरीर में रोग लग गए।
37इसी कारण अंधे मन को सजा मिलती है।
38हे भोले वैद्य ! कोई दवा मत लगाना॥२॥
39चंदन की महत्ता उसकी खुशबू में है और
40मनुष्य का फल शरीर में चल रही साँसे हैं।
41जब साँसे छूट जाती हैं तो शरीर मिट्टी हो जाता है।
42तत्पश्चात् कोई भोजन ग्रहण नहीं करता॥३॥
43सोने जैसी काया में आत्मा रूपी हंस है,
44जिसमें प्रभु नाम का अंश है।
45प्रभु-नाम से सभी दुख रोग दूर होते हैं।
46गुरु नानक कथन करते हैं कि सच्चे नाम से ही दुख-रोगों से छुटकारा होता है॥४॥२॥७॥
47मलार महला १ ॥
48दुख ऐसा जहर है, जिसे हरिनाम का सिमरन ही मारने वाला है।
49संतोष की शिला पर पीसा जाता है और हाथों से दान के रूप में दिया जाता है।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं