गुरु ग्रंथ साहिब 1255 · Raag Malaar · Guru Nanak Dev Ji
1वह पराए धन, पराई नारी में लीन रहकर निंदा का जहर खाते हुए दुख ही पाता है।
2शब्द को जानकर उसका भय एवं कपट नहीं छूटता और मन एवं मुँह से घन-दौलत की ही लालसा करता है।
3ऐसा स्वेच्छाचारी पापों का भारी बोझ लादकर कष्ट भोगता है और जन्म-मरण में जीवन व्यर्थ गंवा देता है॥१॥
4जिसके मन को शब्द गुरु अच्छा लगता है, वही सुन्दर है।
5कोई भटक-भटक कर योनि-चक्र में बहुत वेष धारण करता है, पर जिसे गुरु बचा लेता है, वही सत्य को पाता है॥१॥रहाउ॥
6मनमति जीव तीर्थ पर भी क्रोध का निवारण कर स्नान नहीं करता और न ही उसे प्रभु का नाम अच्छा लगता है।
7वह नाम रूपी रत्न को त्यागकर जैसे खाली हाथ आया था, वैसे ही चला जाता है।
8इसी वजह से विष्ठा का कीड़ा विष्ठा में ही लीन रहता है।
9जीवन के अधिक स्वादों को पाने के कारण अधिक रोग लग जाते हैं और गुरु के बिना शान्ति प्राप्त नहीं होती॥२॥
10कोई सेवा में लीन होकर प्रेम से प्रभु के गुण गाता है और गुरु से ज्ञान पा कर सत्य का चिन्तन करता है।
11सत्य की खोज करने वाला संसार में यश पाता है और वैर-विरोध करने वाला दुखों में नष्ट हो जाता है। मैं अपने गुरु-परमेश्वर पर कुर्बान जाता हूँ।
12हे प्रभु ! हम नीच, तुच्छ, मंदबुद्धि एवं झूठे हैं और तू उपदेश देकर जीवन संवारने वाला है।
13जिधर आत्मज्ञान है, वहां तू है, तू उद्धार करने वाला, मुक्तिदाता है।॥३॥
14मैं संत पुरुषों के पावन स्थान पर बैठकर ही गुणगान करूँ, परन्तु तेरे कौन-कौन से गुण गाऊँ, तू अपरंपार है।
15हे प्रभु ! तू अदृष्ट है, तेरे दर्शन नहीं किए जा सकते, तू अगम्य है, जन्म-मरण से रहित है, तू सबका मालिक है, सब जीव तेरे वश में हैं।
16मैं दर्शन करके किसे बताऊँ तू कैसा है, हम सब मांगने वाले हैं, तू देने वाला है।
17नानक का कथन है कि मैं भक्तिविहीन तेरा द्वार देख रहा हूँ, तेरा नाम मिल जाए तो मैं हृदय में धारण कर लूं॥४॥३॥
18मलार महला १ ॥
19जिस स्त्री ने अपने पति-प्रभु के प्रेम का स्वाद नहीं लिया, दुख में रोते हुए उसका बदन मुरझा गया है।
20कर्मो के बन्धन में फंसी हुई वह निराश हो गई है और गुरु के बिना भ्रम में भटकती है॥१॥
21हे बादल ! तू बरस, मेरा पति प्रभु घर में आ गया है।
22मैं अपने प्रियतम गुरु पर बलिहारी जाती हूँ, जिसने मुझे प्रभु से मिला दिया है॥१॥रहाउ॥
23जिसकी नित्यनवीन प्रीति सदा ठाकुर जी से है, उसकी भक्ति अच्छी लगती है।
24गुरु ने भगवान के दर्शन करवाए तो उसकी बन्धनों से मुक्ति हो गई, अतः युग-युग ईश्वर की भक्ति ही शोभायमान है॥२॥
25हे प्रभु ! हम तेरे हैं, तीनों लोक एवं समूचा जगत तुम्हारा है, तू मेरा (मालिक) है और मैं तेरा (सेवक) हूँ।
26सतगुरु से मिलकर परमात्मा प्राप्त हुआ है और अब पुनः संसार-सागर का चक्र नहीं लगेगा॥३॥
27अपने पति-प्रभु को देखकर जीव-स्त्री खिल गई है तो ही उसका सच्चा श्रृंगार हुआ है।
28प्रभु के साथ मिलकर वह सत्यशील हो गई है और गुरु की शिक्षा से हरि-नाम ही उसका आसरा बना है॥४॥
29गुरु ने बन्धन खोल दिए तो मुक्ति प्राप्त हो गई और शब्द-गुरु से प्रतिष्ठा प्राप्त हुई है।
30हे नानक ! राम नाम हृदय में धारण किया तो गुरु ने उसे ईश्वर से मिला दिया॥५॥४॥
31महला १ मलार ॥
32हे मनुष्य ! पराई नारी, पराया धन, लोभ, अहंकार इत्यादि विषय-विकारों को छोड़ दो।
33दुष्ट स्वभाव, पराई निंदा, काम, क्रोध जैसे चाण्डाल को त्याग दो॥१॥
34शरीर रूपी महल में ही ईश्वर व्याप्त है,
35पर इस में से अमृत वही व्यक्ति पाता है, जो गुरु के उपदेश रूपी रत्न के जीवन-आचरण अपनाता है॥१॥रहाउ॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं