सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 1251 · Raag Saarang

1श्लोक महला ३॥

2सर्वोच्च शक्ति परमेश्वर का हुक्म अटल है, उसके साथ कोई चतुराई नहीं चल सकती और न ही एतराज किया जा सकता है।

3जो अपना अहम् छोड़कर शरण में आता है, उसकी रज़ा को मान लेता है,

4उस गुरुमुख को यम का दण्ड नहीं मिलता और उसका अभिमान समाप्त हो जाता है।

5हे नानक ! असल में सेवक वही कहलाता है, जो परमात्मा के ध्यान में लीन रहता है॥१॥

6महला ३॥

7हे परमेश्वर ! यह प्राण दान एवं सौन्दर्य सब तेरा ही है।

8मेरे पास केवल अभिमान एवं चतुराई है।

9हम अनेक कर्म करते हैं, लोभ में लीन रहते हैं, पर अहम् कभी दूर नहीं होता।

10नानक का कथन है कि ईश्वर ही करवाता है, जो उसे ठीक लगता है, वही बात अच्छी है॥२॥

11पउड़ी महला ५॥

12खाना-पहनना अर्थात् समूचा जीवन आचरण सत्य पर ही आधारित है और सच्चा नाम ही हमारा एकमात्र आसरा है।

13पूर्ण गुरु ही देने वाले प्रभु से मिलाने वाला है।

14जिसने निरंकार का नाम जपा है, उनका पूर्ण भाग्य जाग गया है।

15साधु पुरुषों की संगत में संसार-सागर से पार हुआ जा सकता है।

16हे नानक ! प्रभु का स्तुतिगान करो; उसी की जय-जय करो॥३५॥

17श्लोक महला ५॥

18परमात्मा अपनी मेहर करके सब जीवों का पालन-पोषण करता है।

19वह अत्याधिक अनाज-पानी पैदा करता और लोगों की दुख-तकलीफों को दूर करके पार उतारता है।

20दाता ने प्रार्थना सुनी तो समूची सृष्टि को शांत कर दिया।

21वह दीनों को गले लगा लेता है और सब मुसीबतें दूर करता है।

22हे नानक ! प्रभु नाम का ध्यान करो, उसका घर फलदायी है॥१॥

23महला ५॥

24ईश्वर का हुक्म हुआ तो सुन्दर बादल बरस उठे।

25अधिक मात्रा में अनाज उत्पन्न हुआ है और पूरे संसार को शान्ति प्राप्त हुई है।

26प्रभु के स्मरण से तन मन खिल गया है।

27संसार के रचयिता सच्चे प्रभु ने अपनी कृपा की है।

28हे प्रभु ! जो तू चाहता है, वही करता है, नानक तुझ पर सदैव कुर्बान है॥२॥

29पउड़ी॥

30वह प्रभु स्वयं तो बड़ा है, उसकी कीर्ति भी बहुत बड़ी है।

31गुरु के उपदेश से उसके दर्शन करके मन खिल गया है और शान्ति प्राप्त हुई है।

32सब में अपने आप वही कार्यशील है और स्वयं ही सब कुछ है।

33वह दुनिया का मालिक है, उसने सबको काबू किया हुआ है और सब पर उसी का हुक्म चल रहा है।

34नानक का कथन है कि जो परमात्मा चाहता है, वही करता है, सब लोग उसकी रज़ा में चलते हैं।॥३६॥१॥शुद्ध-मूल के साथ मिलान है॥

35रागु सारंग बाणी भगतां की ॥

36कबीर जी ॥

37ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

38हे नर ! छोटी-सी बात का भी तू क्यों इतना अभिमान करता है ?

39दस मन अनाज तथा चार पैसे तेरे पास हैं तो भी भला क्यों घमण्ड में टेढ़ा चलता है॥१॥रहाउ॥

40सौ गांव अथवा दो लाख टके की सम्पति प्राप्त करके लोगों में बहुत प्रताप फैल जाता है।

41जिस प्रकार वन के हरे पते हैं, वैसे ही चार दिन की तुम्हारी प्रभुता है॥१॥

42न कोई धन-दौलत लेकर आया है और न ही कोई इसे लेकर जाता है।

43रावण सरीखे कितने ही बड़े-बड़े छत्रपति भी पल में खत्म हो गए हैं।॥२॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं