सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 1250 · Raag Saarang · Guru Amar Daas Ji

1अंत में धन की वजह से वैर-विरोध ही होता है और कोई भी इससे बचा नहीं पाता।

2हे नानक ! प्रभु-नाम बिना ऐसे मोह को धिक्कार है, जिसकी वजह से दुख ही दुख प्राप्त होता है।॥३२॥

3श्लोक महला ३॥

4गुरुमुख के लिए हरि-नाम अमृतमय है, जिससे तमाम भूख दूर हो जाती है।

5जब नाम मन में बस जाता है तो तृष्णा बिल्कुल नहीं रहती।

6हरि-नाम बिना अन्य खाने से शरीर में रोग ही लगता है।

7हे नानक ! शब्द की स्तुति को स्वादिष्ट व्यंजन माना जाए तो प्रभु स्वयं ही मिला लेता है॥१॥

8महला ३॥

9सब जीवों में शब्द ही प्राण है, जिससे मालिक से मिलन होता है।

10शब्द के बिना जगत में अंधेरा है और शब्द से ही परम सत्य प्रगट होता है।

11ग्रंथों को पढ़-पढ़कर पण्डित एवं मौन धारण कर मौनी भी थक चुके हैं। वेषाडम्बरी साधु तीर्थों में शरीर को धोकर थक गए हैं।

12शब्द के बिना किसी ने परमात्मा को नहीं पाया और दुखी लोग रो कर संसार से चले गए हैं।

13हे नानक ! परमात्मा की प्राप्ति उसकी कृपा-दृष्टि से ही होती है।॥२॥

14पउड़ी॥

15स्त्री-पुरुष दोनों में अत्यंत प्रेम होता है और मिलकर विषय-विकारों की सलाह बनाते हैं।

16यह दृश्यमान समूचा संसार नाश होने वाला है और मेरे प्रभु को यही मंजूर है।

17जगत में किस तरह स्थिर रहा जा सकता है, इसका कोई उपाय निकालो।

18यदि पूरे गुरु की सेवा की जाए तो जीवन में स्थिर रहा जा सकता है।

19हे नानक ! जब वह कृपापूर्वक मिला देता है तो प्राणी हरि-नाम में विलीन हो जाता है॥३३॥

20श्लोक महला ३॥

21माया मोह की वजह से मनुष्य ने गुरु का प्रेम भुला दिया है।

22लोभ की लहर में उसकी बुद्धि भ्रष्ट हो गई है और यह सत्य से प्रेम नहीं लगाता।

23गुरु के द्वारा जिनके मन में शब्द बस जाता है, उसे परमात्मा के दरबार में मोक्ष प्राप्त होता है।

24हे नानक ! वह रहमदिल प्रभु स्वयं अपने साथ मिला लेता है॥१॥

25महला ४॥

26हे नानक ! जिसके बिना एक घड़ी भी जीना मुश्किल है, जिसे भुलाने से गुजारा नहीं हो सकता।

27उस प्रभु से भला क्यों रूठा जाए, जिसे हमारी चिंता लगी हुई है॥२॥

28महला ४॥

29धीरे-धीरे सावन आया है, गुरमुख हरि-नाम का भजन करके लुत्फ उठा रहे हैं।

30मूसलाधार बरसात होने के कारण सब दुख, भूख एवं चिंता दूर हो गई है।

31समूची धरती हरी भरी हो गई है और काफी मात्रा में अनाज की पैदावार हुई है।

32परमात्मा नैसर्गिक ही कृपा करके बुलाता है और सेवा सफल करता है।

33हे भक्तजनो ! उस परमपिता परमेश्वर का मनन करो, अंतकाल वही बचाने वाला है।

34परमात्मा की भक्ति एवं कीर्तिगान में आनंद ही आनंद है और मन में सदैव सुख बस जाता है।

35जो गुरु के सान्निध्य में हरि-नाम की आराधना करते हैं, उनका दुख भूख दूर हो जाते हैं।

36हे नानक ! प्रभु के गुणगान से ही तृप्ति होती है और वह स्वाभाविक ही दर्शन देता है॥३॥

37पउड़ी॥

38पूर्ण गुरु की बख्शिश में दिन-रात वृद्धि होती रहती है।

39वह दया का घर प्रसन्न होकर देता रहता है और छिपाने से छिप नहीं पाती।

40हृदय कमल खिल उठता है और जिज्ञासु एकाग्रचित होकर प्रभु के ध्यान में लीन रहता है।

41यदि कोई उसकी रीस करता है तो अपमानित ही होता है।

42हे नानक ! पूर्ण सतगुरु की कीर्ति तक कोई पहुँच नहीं सकता॥३४॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं