सिख धर्म
वापस

गुरु ग्रंथ साहिब 124 · Raag Maajh · Guru Amar Daas Ji

1कई व्यक्ति मिथ्या माया के मोह में फँसे हुए हैं। वे मिथ्या माया रूपी फल ही प्राप्त करते हैं।

2द्वैत-भाव में फँसकर वह अपना जीवन व्यर्थ ही गंवा लेते हैं।

3वह स्वयं तो भवसागर में डूब जाते हैं और अपने समूह वंशों को भी डुबा लेते हैं। झुठ बोलकर वह माया रूपी विष सेवन करते हैं।॥६॥

4गुरु के माध्यम से कोई विरला पुरुष ही अपने शरीर में अपने मन को देखता है।

5जब वह अपने अहंकार को मिटा देता है तो ही उसके अन्तर्मन में भगवान की प्रेम-भक्ति उत्पन्न होती है। प्रेम-भक्ति द्वारा उसका अहंकार सूख जाता है।

6सिद्ध,साधक और मौनधारी सुरति लगाकर थक गए हैं। उन्होंने भी अपने तन में मन को नहीं देखा॥७॥

7वह सृजनहार प्रभु स्वयं ही जीवों से कार्य करवाता है।

8अन्य कोई क्या कर सकता है? प्रभु के उत्पन्न किए जीवों द्वारा करने से क्या हो सकता है?

9हे नानक ! जिसको प्रभु अपने नाम की अनुकंपा करता है, वही उसको पाता है और वह मनुष्य नाम को सदैव ही अपने हृदय में बसाकर रखता है॥८॥२३॥२४॥

10माझ महला ३ ॥

11इस शरीर रूपी गुफा में ही नाम का अमूल्य भण्डार मौजूद हैं।

12इस गुफा में ही अलक्ष्य एवं अपरंपार प्रभु निवास करता है।

13वह स्वयं ही अप्रत्यक्ष एवं स्वयं ही प्रत्यक्ष है और गुरु के शब्द से आत्माभिमान नष्ट हो जाता है।॥१॥

14मैं उन पर तन-मन से न्योछावर हूँ जो अमृत नाम को अपने हृदय में बसाते हैं।

15यह अमृत नाम महारस है और इसका स्वाद बड़ा मधुर है। यह नाम रूपी अमृत गुरु के उपदेश द्वारा पान किया जाता है॥१॥ रहाउ ॥

16जो व्यक्ति अपने अहंकार को नष्ट करके वज्र कपाट खोल लेता है,

17वह गुरु की कृपा से अमूल्य नाम को प्राप्त कर लेता है।

18गुरु के शब्द बिना किसी को भी नाम प्राप्त नहीं होता। नाम को गुरु की दया से ही हृदय में बसाया जा सकता है॥ २॥

19जो व्यक्ति गुरु का ज्ञान रूपी सच्चा सुरमा अपने नेत्रों में डालता है,

20उसके हृदय में ज्ञान का प्रकाश हो जाता है और अज्ञानता का अँधेरा मिट जाता है।

21उसकी ज्योति परम ज्योति में विलीन हो जाती है तथा उसका मन नाम-सिमरन से संतुष्ट हो जाता है और भगवान के दरबार में वह बड़ी शोभा प्राप्त करता है॥३॥

22यदि कोई व्यक्ति अपनी देहि से बाहर किसी अन्य स्थान पर प्रभु की तलाश में जाए तो वह नाम को नहीं पाता, अपितु बेगारी की तरह अधिक कष्ट सहन करता है।

23ज्ञानहीन मनमुख व्यक्ति इधर-उधर भटकने के पश्चात पुनः अपने घर लौट आता है परन्तु उसे नाम का ज्ञान नहीं होता। लेकिन सतिगुरु द्वारा वह असली पदार्थ को भीतर से ही प्राप्त कर लेता है॥४॥

24गुरु की कृपा से वह सत्यस्वरूप परमात्मा को पा लेता है।

25उसकी अहंकार की मलिनता दूर हो जाती है और अपने मन एवं तन में वह प्रभु के ही दर्शन करता है।

26श्रेष्ठ स्थान सत्संग में विराजमान होकर वह सदैव प्रभु का यशोगान करता है और सत्य-परमेश्वर में लीन हो जाता है।॥५॥

27शरीर रूपी घर को दो नेत्र, दो कान, दो नासिका, मुँह, गुदा एवं इन्दी यह नौ द्वार लगे हुए हैं। इनके द्वारा ही मन बाहर भटकता रहता है।

28जो व्यक्ति इन द्वारों को बंद करके अपने भटकते मन को नियंत्रित कर लेता है तो उसका मन अपने आत्म-स्वरूप में निवास कर लेता है।

29वहाँ पर दिन-रात अनहद शब्द गूंजता रहता है। अनहद शब्द को गुरु की मति द्वारा ही सुना जा सकता है॥६॥

30शब्द के बिना अन्तर्मन में अज्ञानता का अँधेरा बना रहता है।

31मनुष्य को नाम रूपी वस्तु प्राप्त नहीं होती और उसका आवागमन का चक्र मिटता नहीं।

32सतिगुरु के पास ब्रह्म-विद्या रूपी कुंजी है। किसी अन्य विधि से यह द्वार खुलता नहीं और गुरु पूर्ण भाग्य से ही मिलता है।॥७॥

33हे ईश्वर ! तू गुप्त अथवा प्रत्यक्ष रूप में सर्वत्र विद्यमान है।

34गुरु की कृपा से प्रभु को मिलने से ही मनुष्य को इस भेद का ज्ञान होता है।

35हे नानक ! तू सदैव भगवान के नाम की महिमा-स्तुति किया कर, चूंकि गुरु के माध्यम से ही मनुष्य के मन में नाम का निवास होता है॥ ८॥२४ ॥ २५ ॥

36माझ महला ३ ॥

37जो व्यक्ति गुरु की शरण में आता है, उसे भगवान मिल जाता है और भगवान स्वयं ही गुरु से मिलाकर अपने साथ मिला लेता है।

38ऐसे व्यक्ति को मृत्यु देख भी नहीं सकती और कोई दुख-क्लेश उसे पीड़ित नहीं कर सकता।

39ऐसा व्यक्ति अपने अहंकार को नष्ट करके माया के तमाम बन्धनों को तोड़ देता है। गुरु की शरण में रहने वाला व्यक्ति नाम द्वारा सुशोभित हो जाता है॥१॥

40मैं उन पर तन-मन से न्योछावर हूँ जो हरि-प्रभु के नाम से सुन्दर बन जाते हैं।

41गुरमुख भगवान की महिमा-स्तुति करता रहता है और मस्त होकर नाचता झूमता है और वह भगवान से अपना चित्त लगाकर रखता है॥१॥ रहाउ॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं