सिख धर्म
वापस

गुरु ग्रंथ साहिब 1249 · Raag Saarang · Guru Amar Daas Ji

1हे नानक ! गुरु परमेश्वर रखवाला है और गुरु की शरण में आने से बन्धनों से मुक्ति हो जाती है।॥३०॥

2श्लोक महला ३॥

3ग्रंथों-शास्त्रों को पढ़-पढ़कर पण्डित तर्क-वितर्क करते हैं और मोह-माया में पड़े रहते हैं।

4वे द्वैतभाव में लीन होकर ईश्वर को भुला देते हैं और ऐसे मूर्ख दण्ड प्राप्त करते हैं।

5जिसने पैदा किया है, रोजी-रोटी देकर निर्वाह कर रहा है, उसकी सेवा नहीं करते।

6इनका मौत का फन्दा गले से नहीं कटता और पुनः पुनः जन्मते मरते हैं।

7सच्चा गुरु उनको ही मिलता है, जिसके भाग्य में पूर्व से लिखा होता है।

8हे नानक ! वे प्रतिदिन हरिनाम का ध्यान करते हैं और परम सत्य में समाहित हो जाते हैं॥१॥

9पउड़ी॥

10जो गुरु के चरणों में आते हैं, वे सत्य का व्यापार करते हैं और परम सत्य की उपासना करते हैं।

11हे नानक ! गुरु की रज़ा में चलने वाले स्वाभाविक ही सत्य में विलीन हो जाते हैं।॥२॥

12पउड़ी॥

13अनेक आशाओं में अत्याधिक दुख ही नसीब होता है, परन्तु स्वेच्छाचारी इनमें चित लगाता है।

14गुरुमुख सब आशाओं को छोड़कर परम सुख पाता है।

15वह गृहस्थ जीवन में विरक्त रहकर ईश्वर में लगन लगाता है।

16उसे कोई गम अथवा वियोग प्रभावित नहीं करता और वह ईश्वर की रज़ा में खुश रहता है।

17हे नानक ! ऐसा भक्त ईश्वर की भक्ति में लीन रहता है और उसी में मिल जाता है॥३१॥

18श्लोक महला ३॥

19पराई अमानत को भला क्यों रखा जाए, इसे लोटा देने से ही सुख प्राप्त होता है।

20गुरु का शब्द तो गुरु के अन्तर में टिकता है और किसी अन्य मनुष्य में प्रगट नहीं होता।

21यदि अन्धे को माणिक्य मिल जाए तो वह घर-घर बेचने जाता है।

22इन लोगों को स्वयं कोई परख नहीं होती और कौड़ी भी प्राप्त नहीं होती।

23यदि स्वयं परख करनी नहीं आती तो पारखियों से परख करवा कर मूल्य पड़ सकता है।

24यदि ईश्वर से चित्त लगाया जाए तो नवनिधि रूपी नाम प्राप्त हो जाता है।

25हृदय घर में नाम धन होते हुए भी जगत भूखा मरता है और सच्चे गुरु के बिना सूझ नहीं होती।

26शीतल प्रभु-शब्द मन तन में बस जाए तो कोई शोक-वियोग प्रभावित नहीं करता।

27मूर्ख मनुष्य पराई वस्तु को अपना मानकर अहंकार करता है और अपना अहं ही जतलाता है।

28हे नानक ! सत्य को समझे बिना किसी ने ईश्वर को नहीं पाया और मनुष्य पुनः पुनः आता जाता है॥१॥

29महला ३॥

30प्रियतम प्रभु को मिलकर मन में आनंद उत्पन्न हो गया है और प्यारे संत एवं सज्जन खुशी से खिल उठे हैं।

31यदि ईश्वर स्वयं ही मिला ले तो वे मिलकर कभी नहीं बिछुड़ते।

32गुरु को पाकर उनके अन्तर्मन में ब्रह्म शब्द अवस्थित होता है और सब दुखों का निवारण हो जाता है।

33वे सदैव सुखदाता परमेश्वर की प्रशंसा करते हैं और अन्तर्मन में उसे बसाकर रखते हैं।

34कोई मनमुख उनकी निंदा कैसे कर सकता है, जो सच्चे शब्द द्वारा संवर जाते हैं।

35मेरा प्यारा प्रभु स्वयं उनकी इज्जत रखता है, जो गुरु की शरण में आते हैं।

36हे नानक ! ऐसे व्यक्ति गुरु के सान्निध्य में सुखी रहते हैं और प्रभु के दरबार में उनका मुख उज्ज्वल होता है॥२॥

37पउड़ी॥

38स्त्री-पुरुष का आपस में बहुत प्रेम होता है और उनका मिलन मोह में वृद्धि करता है।

39मोह-माया के कारण मनुष्य अपने प्रिय पुत्र एवं पत्नी को देखकर रोज़ खुश होता है।

40वह उनकी खातिर देश-प्रदेश से धन चोरी करके भी उनके लिए आता है।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं