गुरु ग्रंथ साहिब 1247 · Raag Saarang
1पउड़ी॥
2शरीर रूपी किले को अनेक प्रकार से श्रृंगार कर बनाया गया है।
3जीव रंग-बिरंगे वस्त्र इस पर पहनता है।
4वह लाल, सफेद गद्दों, बिस्तरों को कमरे में सजाता है और
5अभिमान में दुखों को ही खाता एवं भोगता है।
6हे नानक ! लेकिन अन्तिम समय मुक्त करवाने वाले हरि-नाम को याद नहीं करता॥२४॥
7श्लोक महला ३॥
8शब्द में लीन रहकर स्वाभाविक ही सुखी हूँ।
9प्रभु ने स्वयं गले लगाकर मिला लिया है।
10सहज स्वाभाविक दुविधा दूर हो गई है और
11मन में हरि-नाम आ बसा है।
12जो अन्तर्मन को तोड़कर नया बनाता है, ईश्वर उसे गले से लगा लेता है।
13हे नानक ! जिसके भाग्य में आरम्भ से मिलन है, वे अब भी आकर मिल गए हैं।॥१॥
14महला ३॥
15जिन्होंने हरि-नाम को भुला दिया है, उनके लिए अन्य पाठ-पूजा व्यर्थ है।
16दुनियावी धंधों में लिप्त ऐसे लोग विष्ठा में कीट की मानिंद हैं।
17हे नानक ! हमें परमात्मा का नाम विस्मृत न हो, क्योंकि अन्य लालच झूठे हैं।॥२॥
18पउड़ी।
19जो हरि-नाम की सराहना करते हैं, नाम का मनन करते हैं, वही जगत में स्थिर हैं।
20उनके हृदय में परमात्मा की याद बनी रहती है एवं अन्य कोई नहीं होता।
21वे रोम-रोम से परमात्मा का नामोच्चारण करते हैं और पल-पल एक वही बना रहता है।
22ऐसे गुरमुखों का जन्म सफल होता है और मन की मैल दूर करके वे निर्मल बने रहते हैं।
23हे नानक ! जीते जी परमेश्वर का ध्यान करने वाले मोक्ष के हकदार होते हैं॥२५॥
24श्लोक महला ३॥
25जो परमात्मा के नाम को भुलाकर अन्य कर्मकाण्डों में लीन रहते हैं।
26नानक का कथन है कि ऐसे लोगों की यमपुरी में ऐसे पिटाई होती है, जैसे चोरी करने वाले चोर का हाल होता है॥१॥
27महला ५॥
28परमात्मा का भजन करने वाले जिज्ञासुओं के लिए धरती सुहावनी होती है और आकाश भी सुन्दर लगता है।
29हे नानक ! नाम से विहीन लोगों का शरीर कौए ही खाते हैं।॥२॥
30पउड़ी॥
31जो प्रेमपूर्वक हरि-नाम की प्रशंसा करते हैं, वे अपने सच्चे घर में रहते हैं।
32ऐसे व्यक्ति पुनः योनियों में नहीं आते और न ही उनका अन्त होता है।
33वे साँस लेते, भोजन का निवाला लेते ईश्वर के रंग में लीन रहते हैं।
34इन गुरमुखों के मन में प्रकाश होता है और ईश्वर-भक्ति का रंग कभी नहीं उतरता।
35हे नानक ! ईश्वर कृपा करके उन्हें साथ मिला लेता है॥२६॥
36श्लोक महला ३॥
37जब तक यह मन संसार की लहरों में पड़ा रहता है, उतना ही अहंकार ग्रस्त रहता है।
38इसे शब्द का आनंद नहीं आता और न ही हरि-नाम से प्रेम लगता है।
39उसकी सेवा सफल नहीं होती और खप-खप कर ख्वार होता है।
40हे नानक ! सेवक वही कहलाता है, जो सर्वस्व अर्पण कर देता है,
41वह सच्चे गुरु की रज़ा को मान कर शब्द को हृदय में बसाकर रखता है॥१॥
42महला ३॥
43असल में वही जप, तपस्या, सेवा एवं चाकरी है, जो मालिक को अच्छी लगती है।
44अगर अहम्-भाव को दूर किया जाए तो प्रभु स्वयं ही कृपा करके मिला लेता है।
45वह मिलकर कभी जुदा नहीं होता और उसकी ज्योति परम-ज्योति में विलीन हो जाती है।
46हे नानक ! गुरु की कृपा से वही तथ्य को समझता है, जिसे वह समझाता है।॥२॥
47पउड़ी॥
48अभिमानी मनमुख व्यक्ति के प्रत्येक कर्म का हिसाब होता है।
49वह परमात्मा का कभी चिंतन नहीं करता और यमदूतों से दण्ड भोगता है।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं