सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 1246 · Raag Saarang

1महला १॥

2मन से अज्ञानांध लोग कुएं के समान हैं, वे अपने वचन का पालन नहीं करते।

3मन से अज्ञानांध लोगों का हृदय-कमल उलटा ही होता है और वे खड़े कुरुप ही दिखाई देते हैं।

4कुछ लोगों को बातचीत करने का तरीका होता है, वे कहे हुए वचन का भेद समझते हैं, दरअसल ऐसे मनुष्य ही बुद्धिमान एवं सुन्दर होते हैं।

5किसी को गीत-संगीत एवं वेदों का कोई ज्ञान नहीं और न ही भले-बुरे को जानते हैं।

6किसी को कोई होश नहीं होती, न बुद्धि होती है, न ही अक्ल होती है और तो और अक्षर-ज्ञान का भेद भी नहीं जानते।

7गुरु नानक फुरमाते हैं कि जो बिना गुणों के भी अहंकार करते हैं, ऐसे व्यक्ति असल में गधे ही हैं ॥२॥

8पउड़ी ॥

9गुरुमुखों के लिए धन, सम्पति, माया इत्यादि सब पवित्र हैं,

10जो प्रभु-सेवा में खर्च करते हैं, उन्हें देते हुए सुख ही मिलता है।

11हरि-नाम का ध्यान करने वालों को कोई कमी नहीं आती।

12गुरुमुखों को सब ओर ईश्वर ही दिखाई देता है, अतः माया को वे दूर फेंक देते हैं।

13हे नानक ! भक्तों को अन्य कुछ याद नहीं आता, वे तो हरि-नाम चिंतन में लीन रहते हैं।॥ २२ ॥

14श्लोक महला ४ ॥

15सतगुरु की सेवा करने वाले भाग्यशाली हैं,

16जिनकी सच्चे शब्द गान में लगन लगी रहती है।

17वे अपनी गृहस्थी परिवार में प्रभु के ध्यान में आनंद-मग्न रहते हैं।

18हे नानक ! हरि-नाम में निमग्न रहने वाले ही सच्चे वैराग्यवान हैं।॥१॥

19महला ४ ॥

20लाभ का हिसाब लगाकर की गई सेवा सफल नहीं होती, सब निष्फल हो जाता है।

21इससे शब्दगान का आनंद नहीं आता और न ही सत्य से प्रेम होता है।

22उसका सच्चे गुरु से प्रेम नहीं होता, वह मन के हठ से कार्य करके आता जाता रहता है।

23यदि वह एक कदम आगे उठाता है तो दस कंदम पीछे चला जाता है।

24सतगुरु की सेवा वही सफल एवं फलदायक है, अगर गुरु की रज़ा में सेवा की जाए।

25अहम्-भावना को छोड़कर सतगुरु से मिलने वाला सुख-शान्ति में लीन रहता है।

26हे नानक ! ऐसे व्यक्ति को परमात्मा का नाम हरगिज नहीं भूलता और वह सच्चे प्रभु से मिला रहता है।॥२॥

27पउड़ी ॥

28बड़े-बड़े बादशाह एवं खान कहलाने वाले भी सदा नहीं रह पाते।

29भव्य महल और घर इत्यादि कुछ भी साथ नहीं जाता।

30अगर कोई सोने की काठी डालकर पवन की रफ्तार की तरह घोड़े को दौड़ाता है, तो इसकी चतुराई पर धिक्कार है।

31छत्तीस प्रकार के स्वादिष्ट व्यंजन खाने वाला मनुष्य अपनी मैल में और भी वृद्धि करता है।

32हे नानक ! जो दे रहा है, उस परमात्मा को मानता नहीं, ऐसा स्वेच्छाचारी दुख ही पाता है॥ २३ ॥

33श्लोक महला ३ ॥

34वेद-शास्त्रों का पाठ-पठन कर पण्डित एवं मौन रहकर मौनी थक गए हैं, देश-देशान्तर भ्रमण करके वेषधारी साधु भी थक गए हैं।

35द्वैतभाव में नाम कभी प्राप्त नहीं होता और भारी दुख ही लगे रहते हैं।

36माया के व्यापारी मूर्ख एवं अन्धे हैं, जो तीन गुणों में लीन रहते हैं।

37इनके मन में कपट होता है, ऐसे गंवार अपना पेट भरने के लिए पाठ-पूजा करते हैं।

38जो अहम् को त्यागकर सतिगुरु की सेवा करते हैं, वही सुख प्राप्त करते हैं।

39हे नानक ! कोई मननशील इस तथ्य को समझता है कि केवल हरिनाम का पठन एवं गुणानुवाद ही सफल है॥१॥

40महला ३॥

41दुनिया में खाली आना और खाली ही चले जाना है, यह विधाता का विधान है तो फिर भला आपत्ति कैसे की जा सकती है।

42(अपने की मृत्यु पर) किसी से गुस्सा करना ठीक नहीं, क्योंकि जिस (प्रभु) की वस्तु होती है, वही ले जाता है।

43जो गुरमुख होता है, वह परमात्मा की रज़ा को मानता है और स्वाभाविक ही हरि-नाम का पान करता है।

44हे नानक ! सदा सुखदाता की स्तुतिं करो, रसना से प्रभु भजन में निमग्न रहो ॥२॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं