गुरु ग्रंथ साहिब 1245 · Raag Saarang · Guru Nanak Dev Ji
1गुरु की प्रसन्नता से हृदय में उजाला होता है और अज्ञान का अन्धेरा दूर हो जाता है।
2(मनुष्य रूपी) लोहा (गुरु रूपी) पारस से मिलकर सोना हो जाता है।
3हे नानक ! सतगुरु के मिलने से ही हरि-नाम प्राप्त होता है, तब परमेश्वर के नाम का ध्यान-मनन होता है।
4जिनके भाग्य में पुण्य फल होता है, उनको ही हरि-दर्शन प्राप्त होते हैं।॥ १६॥
5श्लोक महला १॥
6(छी ! छी !!) ऐसे व्यक्तियों का जीना धिक्कार योग्य है, जो नाम लिख-लिखकर बेच रहे हैं।
7खेती तो उजाड़ते जा रहे हैं, खलिहान के वक्त क्या बचेगा।(यदि नाम रूपी लाभ ही बेच दिया तो फल क्या मिलेगा)
8सत्य एवं मेहनत के बिना ईश्वर के आगे कोई श्रेय नहीं मिलता।
9यदि विवाद एवं झगड़े में बुद्धि को बर्बाद किया जाए तो बुद्धिमानी नहीं कहा जाता।
10काबलियत एवं बुद्धिमता से परमात्मा की उपासना करो, इस बुद्धिमता से ही मान-प्रतिष्ठा को प्राप्त किया जा सकता है।
11बुद्धि से पठन कर समझना चाहिए और अन्यों को भी बुद्धि प्रदान करो।
12गुरु नानक कथन करते हैं कि केवल यही सच्चा रास्ता है, अन्य बातें तो शैतानों का काम है॥१॥
13महला २ ॥
14जरूरत इस बात की है कि जैसा कोई (भला-बुरा) आचरण करता है, वैसा ही स्वयं को कहला सकता है।
15ऐसा ही जीव सुन्दर रूप वाला कहा जाता है, जिसके पास गुण रूपी अंग हैं, बुराइयों से भरा कुरुप नहीं होना चाहिए।
16हे नानक ! वही प्रतिष्ठित कहलाता है, जो ईश्वर को मनाता है, जो कामना करता है, वह वही फल पाता हैI॥२॥
17पउड़ी ॥
18सतगुरु अमृत का वृक्ष है, जिसे अमृत रस का फल लगता है
19जिसे प्राप्त होता है, वही फल पाता है और गुरु के उपदेश से ही मिलता है।
20जो सतगुरु की रज़ा में चलता है, वह ईश्वर के साथ लीन हो जाता है।
21उसके हृदय में ज्ञान का आलोक होता है और यमदूत उसे तंग नहीं करते।
22हे नानक ! ईश्वर कृपा करके अपने साथ मिला लेता है और पुनः वह गर्भ योनि में तंग नहीं होता ॥ २० ॥
23श्लोक महला १॥
24वही मनुष्य महत्वपूर्ण है, जिसका सत्य ही व्रत-उपवास, संतोष तीर्थ एवं ज्ञान-ध्यान स्नान होता है।
25वह दया को देवता एवं क्षमा भावना को जपने वाली माला मानता है।
26उसकी सच्ची जीवन-युक्ति ही धोती, सुरति चौका और शुभ कर्म ही तिलक होता है।
27लोगों से प्रेम करना भोजन होता है, गुरु नानक फुरमाते हैं, ऐसा मनुष्य कोई विरला ही होता है।॥१॥
28महला ३॥
29यदि सत्य को नियम बनाया जाए तो वही नवर्मी है।
30काम, क्रोध एवं तृष्णा को छोड़ देना चाहिए।
31यदि दस इन्द्रियों को काबू में किया जाए तो वही दसमी है। एक परमेश्वर की सत्ता को मानना ही एकादशी है।
32पाँच विकारों को वश में रखा जाए तो द्वादशी है, गुरु नानक का कथन है कि इस तरह मन प्रसन्न हो सकता है।
33हे पण्डित जी ! ऐसा व्रत रखना चाहिए, भला और अधिक शिक्षा देने का क्या लाभ है॥२ ॥
34पउड़ी ॥
35बादशाह, राजा एवं भिखारी धन-दौलत इकठ्ठा करने में लगे हुए हैं।
36जितना धन इकठ्ठा करते हैं, उनका उतना ही मोह बढ़ता है और पराया धन चुराते हैं।
37इनका धन से इतना प्रेम लगा हुआ है कि अपने पुत्र एवं पत्नी पर भी विश्वास नहीं करते।
38देखते ही देखते दौलत छीन ली जाती है और बाद में पछताते हैं।
39हे नानक ! ऐसे लोगों को यम के द्वार पर दण्ड प्राप्त होता है, ईश्वर को यही मंजूर है॥ २१॥
40श्लोक महूला १ ॥
41ज्ञानविहीन पुजारी ईश्वर के गीत गाता है।
42धन का भूखा मुल्ला घर को मस्जिद बनाकर अपना साधन बनाता है।
43मनुष्य आलसी होकर कान फड़वा कर योगी बन जाता है और
44फकीर बनकर अपनी जाति गंवा देता है।
45कुछ गुरु-पीर कहलाकर माँगने जाते हैं।
46ऐसे लोगों के पैर बिल्कुल नहीं छूने चाहिएं।
47जो मेहनत करके निर्वाह करता है, दूसरों की मदद अथवा दान करता है,
48हे नानक ! ऐसा व्यक्ति ही सच्चा जीवन राह पहचानता है ॥ १॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं