गुरु ग्रंथ साहिब 1244 · Raag Saarang · Guru Nanak Dev Ji
1वेद व्यापारी ही हैं, जो ज्ञान राशि का पूंजी के रूप में इस्तेमाल करते हैं, पर ज्ञान तो प्रभु-कृपा से प्राप्त होता है।
2हे नानक ! ज्ञान-राशि के बिना कोई भी लाभ कमाकर नहीं जाता ॥२॥
3पउड़ी ॥
4अगर नीम का वृक्ष अमृत रस से सींच लिया जाए, इसके बावजूद कड़वा ही रहता है।
5साँप पर भरोसा करके मंत्र से उसे बहुत दूध पिलाया जाए तो भी वह अपनी आदत नहीं छोड़ता।
6मन की मर्जी करने वाला अपने स्वभावानुसार वैसा ही रहता है, जैसे पत्थर को स्नान कराने के बावजूद भी नहीं भीगता।
7यदि जहर में अमृत डाला जाए तो भी जहर का फल ही मिलता है।
8हे नानक ! यदि प्रभु अच्छी संगत में मिला दे तो सारा जहर उतर जाता है।॥ १६॥
9श्लोक महला १॥
10मौत कोई मुहूर्त नहीं पूछती और न ही किसी दिन या तिथि का इंतजार करती है।
11कई मौत की नींद सो गए हैं, कुछ मौत की आगोश में चले गए हैं और कुछ ऐसे भी हैं, जो पापों का बोझ उठाकर चलने के लिए तैयार हैं।
12कोई घोड़ा तैयार करके जाने के लिए तैयार है और कोई संभाल कर रहा है।
13आखिरकार बड़ी-बड़ी फौज, दमामे, सुन्दर घर द्वार छोड़ने ही पड़ते हैं।
14गुरु नानक साहिब चेताते हैं कि शरीर पहले भी धूल मिट्टी था और दोबारा मिट्टी ही हो जाता है॥१॥
15महला १॥
16मिट्टी का शरीर रूपी किला खत्म होकर मिट्टी का ढेर बन जाता है।
17इसके भीतर चोर बैठा हुआ था, हे जीव ! इस तरह सब दोष ही दोष है।॥२॥
18पउड़ी ॥
19जिनके अन्तर्मन में निन्दा है, ऐसे लोग दुष्ट तथा बेशर्म हैं और दूसरों का भी तिरस्कार करवाते हैं।
20माया में लीन वे सदैव दुखी एवं बदशक्ल होते हैं और अपना मुँह काला करवाते हैं।
21वे हर रोज सुबह उठकर पराया धन चुराते हैं और हरि-नाम जपने से मन चुराते हैं।
22हे प्रभु! ऐसे लोगों से मुझे बचा लो और इनकी संगत में हरगिज मत डालना।
23नानक का कथन है कि स्वेच्छाचारी कर्मालेखानुसार ही आचरण करते हैं और दुखी होते हैं।॥ १७ ॥
24श्लोक महला ४ ॥
25सब कुछ मालिक का है, उसी से समूची रचना होती है।
26जो मालिक के हुक्म को मानता है, वही सत्य पाता है।
27गुरु द्वारा आत्म-ज्ञान की पहचान होने से कोई बुरा दिखाई नहीं देता।
28हे नानक ! गुरु के माध्यम से हरि-नाम का चिंतन करने से जीवन सफल हो जाता है।॥१॥
29महला ४ ॥
30सबको देने वाला ईश्वर ही है, वह स्वयं ही मिलाने वाला है।
31नानक हैं कि जो शब्द गुरु द्वारा दाता प्रभु की आराधना करता है, वह मिलकर कभी नहीं बिछुड़ता ॥२॥
32पउड़ी॥
33गुरमुख के अन्तर्मन में नाम-सुमिरन (स्मरण) उत्पन्न हो जाता है, जिससे उसके हृदय में सदा शान्ति रहती है।
34उसका जप, तपस्या, तीर्थ एवं संयम मेरे प्रभु को उपयुक्त लगता है।
35वह शुद्ध हृदय से परमात्मा की आराधना करता है और गुण-गान करते सुन्दर लगता है।
36मेरे प्रभु को यही अच्छा लगता है, वह गुरमुख को संसार-सागर से पार कर देता है।
37हे नानक ! प्रभु गुरमुख को साथ मिला लेता है और वह उसके द्वार में सुन्दर लगता है॥ १८ ॥
38श्लोक महला १ ॥
39धनवान् यही कहता है कि इससे भी अधिक धन-दौलत इकट्टी की जाए।
40लेकिन नानक तो उस दिन खुद को निर्धन मानता है, जिस दिन उसे परमात्मा का नाम भूल जाता है ॥१॥
41महला १ ॥
42ज्यों-ज्यों सूर्योदय एवं अस्त होता है, हर रोज उम्र घटती जाती है।
43मनुष्य का तन मन भोग-पदार्थों में लीन रहता है, कोई जिंदगी हार जाता है तो कोई जीत जाता है।
44हर कोई अभिमान से भरा हुआ है, समझाने के बावजूद भी बात नहीं मानता।
45गुरु नानक कथन करते हैं कि ईश्वर सब देखता है, प्राण छूटते ही मनुष्य खत्म हो जाता है।॥२॥
46पउड़ी ॥
47संतों की संगत हरिनाम रूपी सुखों का घर है, जहाँ परमात्मा प्राप्त होता है।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं