गुरु ग्रंथ साहिब 1242 · Raag Saarang · Guru Nanak Dev Ji
1देवताओं, मनुष्यों, योद्धाओं एवं अवतारों से तथ्य को पूछे ।
2सिद्धों की समाधि में ईश्वर का यश सुन लूं, उसके दरबार का वैभव जाकर देखें।
3आगे सब परम सत्य, निर्भय प्रभु का सच्चा नाम ही है।
4अन्य सब कच्ची बुद्धि, व्यर्थ एवं अज्ञानांध विचार है।
5गुरु नानक फुरमान करते हैं कि परमात्मा की कृपा से ही बंदगी होती है, यदि कृपा-दृष्टि हो जाए तो संसार-सागर से पार लंघा देती है॥२॥
6पउड़ी ॥
7परमेश्वर के नाम-मनन से दुर्मति दूर हो जाती है और सद्बुद्धि प्रगट हो जाती है।
8यदि ईश्वर के नाम का मनन किया जाए तो अहम्-भाव एवं सब रोग दूर हो जाते हैं।
9प्रभु-नाम के मनन से हरिनामोच्चारण ही उपजता है और स्वाभाविक सुख-शान्ति प्राप्त होती है।
10नाम के मनन से मन में शान्ति पैदा होती है और प्रभु मन में अवस्थित होता है।
11हे नानक ! हरि-नाम अमूल्य रत्न है, गुरुमुख ने परमात्मा का भजन किया है॥११॥
12श्लोक महला १॥
13हे सृष्टिकर्ता ! यदि कोई दूसरा तेरा शरीक हो तो उसके समक्ष तेरा ही यश गाऊँगा।
14तेरे पास तेरी प्रशंसा कर रहा हूँ, मैं बेशक अंधा हूँ, पर नाम मेरा दूरदर्शी पड़ गया है।
15जितना कहता हूँ, सब शब्दों में ही हो रहा है और कहना भी स्वभावानुसार ही है।
16गुरु नानक का कथन है कि मेरा अधिकतर यही कहना है कि सब तेरी कीर्ति है॥१॥
17महला १॥
18जब प्राणी का कोई अस्तित्व नहीं था, तब क्या नौकरी करता था। जब जन्म ले लिया तो फिर भला कोन-सी अपनी मर्जी से काम कर रहा है।
19परमेश्वर ही सब कारण करता है और बार-बार देखरेख करता है।
20यदि चुप रहा जाए अथवा मांगा जाए, वह देने वाला स्वेच्छा से देता है।
21यद्यपि पूरा संसार घूमकर देखा जाए तो भी यही ज्ञात होता है कि एकमात्र ईश्वर ही दाता है, सब लोग भिखारी हैं।
22हे नानक ! यही मानना चाहिए कि देने वाला परमेश्वर सदा शाश्वत है।२ ॥
23पाउड़ी ॥
24परमात्मा के नाम-मनन से ज्ञान एवं सद्बुद्धि उत्पन्न होती है।
25हरिनाम को मानने से गुणों का उच्चारण होता है और सुखों की प्राप्ति होती है।
26नाम-मनन से सब भ्रम कट जाते हैं और पुनः कोई दुख प्रभावित नहीं करता।
27नाम-मनन से पाप-बुद्धि धुल जाती है और ईश्वर का स्तुतिगान होता है
28हे नानक ! पूर्ण गुरु से ही हरी नाम का मनन होता है जिसे स्वयं ऐसी शक्ति देता है ॥१२॥
29श्लोक महला १ ॥
30पण्डित शास्त्रों, वेदों एवं पुराणों का पठन करता है,
31सस्वर लोगों को सुनाता है।
32जब ज्ञान होता है तो ही तथ्य की सूझ होती है।
33हे नानक ! फिर चिल्ला-चिल्लाकर लोगों को नहीं कहता ॥१॥
34महला १ ॥
35जब मैं तेरा हूँ तो सबकुछ मेरा ही है, मैं नहीं तो भी तू ही होता है।
36तू सर्वशक्तिमान है, स्वयं ही बुद्धिमान है और अपनी शक्ति से संसार को पिरोया हुआ है।
37प्रभु स्वयं ही भेजता है, स्वयं ही बुला लेता है और सृष्टि की रचना करके देखता है।
38हे नानक ! सच्चे नाम से ही जीव सत्यशील होता है और सत्यशील ही प्रभु दरबार में मान्य होता है॥२॥
39पउड़ी ॥
40नाम निरंजन अदृष्ट है, उसे किस तरह देखा जा सकता है।
41पावन प्रभु नाम हमारे साथ ही है, उसे कैसे पाया जा सकता है।
42निरंजन नाम समूची सृष्टि में कार्यशील है।
43पूर्ण गुरु से ही प्राप्त होता है और हृदय में ही दिखाई देता है।
44नानक का कथन है कि हे भाई ! पर गुरु भी प्रभु की कृपा-दृष्टि से ही मिलता है॥ १३॥
45श्लोक महला १ ॥
46कलियुग के लोग कुत्ते की तरह लालची हो गए हैं और रिश्वत एवं घूसखोरी ही इनका भोजन है।
47ये झूठ बोल-बोलकर भौंकते हैं और धर्म-कर्त्तव्य की बात खत्म हो गई है।
48जिनकी जिंदा रहते इज्जत नहीं, मरने के बाद भी बदनामी ही होती है।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं