गुरु ग्रंथ साहिब 1239 · Raag Saarang
1महला २॥
2दुनिया की क्या सराहना करना ? जिसने बनाया है, उस परमात्मा की प्रशंसा करो।
3हे नानक ! एक ईश्वर के सिवा अन्य कोई दाता नहीं।
4उस स्रष्टा की स्तुति करो, जिसने सृष्टि रचना की है।
5उस दाता की सराहना करो, जो सबको आसरा दे रहा है।
6नानक कथन करते हैं कि वह सदैव रहने वाला है, उसके भण्डार पूर्ण हैं।
7अतः बड़ा मानकर उसी की स्तुति करो, जिसका कोई अन्त एवं आर-पार नहीं ॥२॥
8पउड़ी ॥
9परमात्मा का नाम सुखों की निधि है, उसकी भक्ति से सुख प्राप्त होता है।
10पावन हरि-नामोच्चारण से मनुष्य सम्मानपूर्वक सच्चे घर जाता है।
11गुरु की वाणी नाम है, नाम को हृदय में बसाना चाहिए।
12सतगुरु का ध्यान करने से मति रूपी पक्षी वश में आता है।
13हे नानक ! जिस पर भगवान दयालु होता है, वह नाम भजन में लीन रहता है।॥४॥
14श्लोक महला २ ॥
15उसके आगे भला क्या बोलना, जो स्वयं अन्तर्यामी है।
16दरअसल वही मालिक माना जाता है, जिसके हुक्म को टाला नहीं जाता।
17वही नेता, शासक एवं सेनानायक है, जिसकी आज्ञा में सब लोग चलते हैं।
18नानक का कथन है केि जो ईश्वर को अच्छा लगता है, वही कार्य भला है।
19जिन्हें संसार से चलने का हुक्म आता है, उनके हाथ में कुछ भी नहीं होता।
20मालिक का फुरमान आते ही वे उठकर चल पड़ते हैं।
21जैसी मौत की चिट्ठी लिखी होती है, वैसे ही उसके हुक्म को मानना पड़ता है।
22हे नानक ! ईश्वर के भेजने पर जीव जन्म लेते हैं और मृत्यु का आह्मन होने पर शरीर छोड़ देते हैं।॥१॥
23महला २॥
24जिनको ईश्वर की स्तुति का दान प्राप्त हुआ है, वही पूंजीपति हैं।
25जिनको कुंजी प्राप्त होती है, उनको ही भण्डार मिलता है।
26वही दरबार में मान्य होता है, जिस भण्डारी के पास गुण मौजूद हैं।
27हे नानक ! उन पर ही कृपा-दृष्टि होती है, जिनके पास हरिनाम का चिन्ह होता है।॥२॥
28पउड़ी॥
29पावन हरिनाम का संकीर्तन सुनने से सुख प्राप्त होता है।
30हरिनाम को सुन-सुनकर मन में बसाना चाहिए, जिसे कोई विरला ही बूझता है।
31उठते-बैठते सच्चा हरिनाम भूलना नहीं चाहिए।
32भक्तों का आसरा केवल हरिनाम है और वे नामोच्चारण में ही सुखी रहते हैं।
33हे नानक ! गुरुमुखों के मन-तन में ईश्वर ही बसा हुआ है।॥५॥
34श्लोक महला १॥
35गुरु नानक का कथन है कि यदि दिल की भावना को पलड़े में रखा जाए तो ही तौल पूरा उतरता है (मात्र पूजा-पाठ से तोलना मुमकिन नहीं)।
36परमात्मा की निष्ठापूर्वक उपासना के अतिरिक्त कोई जप-तप, मंत्र तुल्य नहीं, निष्ठापूर्वक नामोच्चारण, नामोपासना से ही प्रभु से मिला जा सकता है।
37परमात्मा को बड़ा मानना अथवा यशोगान ही भारी तौल है।
38अन्य बोलना व चतुराई हलके ही सिद्ध होते हैं।
39ईश्वर का स्तुतिगान धरती, पानी एवं पर्वत से भी भारी है,
40सुनार के तराजू पर भी इसे तौला नहीं जा सकता।
41दरअसल तौले-माशे पुण्य फल की बात बताकर समझाने की कोशिश करते हुए
42नानक कथन करते हैं कि कर्मकाण्ड ऐसा है।
43मूर्ख अज्ञानी की बातें भी अंधी ही होती हैं।
44वह कह-कहकर आत्म-प्रशंसा सिद्ध करता है॥१॥
45महला १ ॥
46ईश्वर की महिमा को कहना और सुनना मुश्किल है, उसकी महिमा करके उसके रहस्य की अनुभूति नहीं हो सकती।
47कोई दिन-रात उलटा लटक कर या सीधा एक ही शब्द रटता रहता है।
48अगर उसका एक रूप हो तो कुछ दिखाई दे, उसका रूप-जाति कोई नहीं है।
49सब ईश्वर ही करता है, छोटा-बड़ा सब वही बनाने वाला है; वह सर्वकर्ता है।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं