सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 1238 · Raag Saarang

1श्लोक महला २ ॥

2हे नानक ! ईश्वर सबको उत्पन्न करता है, स्वयं ही अलग-अलग रखता है।

3बुरा किसको कहा जाए, जब सबका मालिक एक ही है।

4सबका मालिक एक प्रभु ही है, वह सबको अलग-अलग कार्यों में लगाकर देखता है।

5किसी जीव को उसने थोड़ा दिया है, किसी को अधिक दिया हुआ है, परन्तु खाली कोई नहीं है।

6सब जीव नंगे आते हैं, नंगे ही चले जाते है अर्थात् खाली ही आते और जाते हैं परन्तु फिर भी संसार में आडम्बर ही करते हैं।

7हे नानक ! उसके हुक्म को जाना नहीं जा सकता क्योंकि इस बात की भी कोई खबर नहीं आगे किस कार्य में लगाने वाला है॥१॥

8महला १ ॥

9वह अनेक प्रकार के जीवों को संसार में भेजता है और अनेक प्रकार के जीवों को संसार से ले भी जाता है।

10वह स्वयं ही उत्पन्न कर नष्ट भी कर देता है और अनेक प्रकार के वेश करवाता है।

11जितने भी जीव साधु-फकीर बनकर घूमते हैं, उन्हें स्वयं ही भिक्षा देता है।

12हमारा बोलना एवं चलना सब भाग्यानुसार निश्चित है, फिर झूठे दावे करने का कोई लाभ नहीं।

13सच्ची बात यही स्वीकार्य है जो नानक कहकर सुना रहा है,

14कोई कुछ भी कहता कहलाता रहे, कमों के आधार पर ही न्याय होता है॥२॥

15पउड़ी॥

16गुरु ने लीला रची है, जिससे सभी गुण प्रगट हो गए हैं।

17वह सदा गुरु की वाणी का उच्चारण करता है और प्रभु को मन में बसा लिया है।

18माया का प्रपंच दूर हो गया है, भ्रम कट गया है और ज्ञान ज्योति का दीपक प्रज्वलित हो गया है।

19जिनके पास पुण्य हैं, गुरु ने उन्हें परमात्मा से मिला दिया है।

20हे नानक ! वे सहज स्वाभाविक प्रभु नाम में विलीन रहते हैं।॥२॥

21श्लोक महला २ ॥

22परमात्मा रूपी शाह से जीव रूपी व्यापारी चल पड़ते हैं और वह उनका कर्मालेख साथ दे देता है।

23उस लिखे पर हुक्म होता है और उस अनुसार वस्तु मिलती है।

24इस तरह जीव रूपी व्यापारी वस्तुएँ खरीदते हैं और सामान लाद लेते हैं।

25कोई लाभ कमाकर साथ ले चलता है परन्तु कोई मूलधन भी गंवा देता है।

26इन दोनों में से किसी ने थोड़ा नहीं माँगा, फिर किसको शाबाशी दी जाए।

27नानक फुरमाते हैं कि कृपा-दृष्टि उन पर ही हुई जो अपने जीवन की राशि पूर्णतया बचाकर लाते हैं।॥१॥

28महला १ ॥

29जीव कितनी बार मिलते और बिछुड़ जाते हैं, बिछुड़कर दोबारा मिल जाते हैं।

30जन्म लेकर मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं और मरने के बाद पुनः जन्म लेते हैं।इस तरह जन्म-मरण का चक्र चलता रहता है।

31कभी किसी के बाप, किसी के बेटे, किसी के गुरु और किसी के शिष्य बनते हैं।

32आगे-पीछे का हिसाब नहीं लगाया जा सकता कि अतीत में क्या थे और अव वर्तमान में क्या हो गए हैं।

33सब कमों के अनुसार हो रहा है, जैसा भाग्य है, वैसा ही जीव कर रहा है, इस तरह विधाता करवाता जा रहा है।

34गुरु नानक फुरमाते हैं कि स्वेच्छाचारी मौत के चक्र में पड़ा रहता है, पर गुरु की शिक्षा पर चलने वाला मुक्त हो जाता है और ईश्वर समान कृपा-दृष्टि करता है॥२॥

35पउड़ी ॥

36मन की इच्छानुसार चलने वाला दुविधा एवं भ्रम में लीन रहता है और द्वैतभाव व लोभ-लालच में पड़ा रहता है।

37वह झूठ एवं छल-कपट का आचरण अपना कर झूठ ही बोलता है।

38इसका अपने पुत्र एवं पत्नी से मोह तथा प्रेम बना रहता है, जो सभी दुख पहुँचाते हैं।

39वह यम के द्वार पर दण्ड भोगता है और इस तरह भ्रम में ही भटकता है।

40हे नानक ! स्वेच्छाचारी अपना जन्म गंवा देता है, संभवतः ईश्वर को यही मंजूर है॥३॥

41श्लोक महला २॥

42जिनके पास हरि-नाम की कीर्ति है, वे मन में नामोच्चारण में ही लीन रहते हैं।

43हे नानक ! अमृत एक हरि-नाम ही है, दूसरा कोई अमृत नहीं।

44नानक का कथन है कि गुरु की कृपा से अमृत मन में प्राप्त हो जाता है।

45जिनके भाग्य में पूर्व से ही लिखा है, उन्होंने प्रेमपूर्वक नामामृत का पान किया है॥१॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं