सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 1234 · Raag Saarang · Guru Amar Daas Ji

1यह जन्म-जन्म के पाप एवं भय को नाश करने वाला है और गुरु के माध्यम से दर्शन होते हैं।॥१॥रहाउ॥।

2करोड़ों जन्मों के पापों को खत्म करने वाला सच्चा प्रभु ही मेरे मन को भाया है।

3सच्चे गुरु ने एक भेद बता दिया है, जिससे प्रभु बिना अन्य कोई नहीं सूझता ॥१॥

4जिनके दिल में प्रेम बस गया है, वे सुख-शान्ति में लीन रहते हैं।

5प्रभु-शब्द में लीन होने वाले जिज्ञासुओं को प्रेम चढ़ा रहता है और सहज स्वाभाविक ही रत रहते हैं।॥२॥

6मेरी जिव्हा ने शब्द का विचार किया और उसी के रस में रंगकर लाल हो गई है।

7राम नाम के भेद को जानकर मन तृप्त हो गया है और शान्ति प्राप्त हो गई है॥३॥

8पण्डित ग्रंथों का पाठ-पठन कर एवं मोनधारी मोन धारण कर थक गए हैं। वेषाडम्बरी लोग वेष धारण कर थक गए हैं।

9उस निरंकार की प्राप्ति तो गुरु की कृपा एवं सच्चे शब्द का चिन्तन करने से ही होती है॥ ४ ॥

10जिनके मन को सच्चा शब्द अच्छा लगा है, वे आवागमन का निवारण कर सत्य में लीन हो गए हैं।

11जिन्होंने अहम्-भावना को दूर करके सच्चे गुरु की सेवा की है, उनको सदा सुख प्राप्त हुआ है॥५॥

12सच्चे शब्द से मन में ध्वनि उत्पन्न होती है, जिससे प्रभु में लगन लग जाती है।

13अगम्य, मन-वाणी से परे, पावन हरिनाम गुरु मन में बसा देता है॥६॥

14कोई विरला ही इस रहस्य को जानता है कि एक ईश्वर ही समूचे जगत में कार्यशील है।

15शब्द द्वारा मन की वासनाओं को मारकर मनुष्य को पूर्ण जानकारी हो जाती है और वह एक परमेश्वर की सत्ता को मानता है॥७॥

16वही समझता है, जिस पर कृपा-दृष्टि करता है, कोई अन्य कथन नहीं कर सकता।

17गुरु नानक का मत है कि हरिनाम में लीन रहने वाले सदा वैरागी बने रहते हैं और उनकी केवल प्रभु शब्द में ही लगन लगी रहती है॥८॥२॥

18सारग महला ३ ॥

19हे मेरे मन ! हरि की कथा अकथनीय है।

20जिस पर परमेश्वर कृपा करता है, वही भक्त गुरु द्वारा इस कथा का भेद जानता है॥१॥रहाउ॥।

21गुरु के उपदेश से ज्ञान हुआ है कि ईश्वर गहन-गंभीर एवं गुणों का भण्डार है।

22जिन्हें शब्द का भेद प्राप्त नहीं होता, वे द्वैतभाव में अनेक प्रकार के कर्म करके बावले बने फिरते हैं ॥१॥

23जो हरिनाम में स्नान करता है, वही व्यक्ति निर्मल है और पुनः उसे कोई मैल नहीं लगती।

24हरि-नाम बिना समूचा जगत मलिन है और द्वैतभाव में अपनी इज्जत खो रहा है॥२॥

25क्या दृढ़ करूँ, क्या इकठ्ठा करूँ, किसका त्याग करूँ, मुझे तो कुछ समझ नहीं आ रहा।

26हे प्रभु ! दयालु होकर कृपा करो, तेरा नाम ही अन्त में सहायक है॥३॥

27परमात्मा शाश्वत-स्वरूप है, संसार को देने वाला है, कमाँ को बनाने वाला है, जिसे चाहता है, उसे नाम-स्मरण में लगा देता है।

28गुरु के द्वारा वही भेद को समझता है, जिसे स्वयं ज्ञान-शक्ति देता है॥४॥

29अद्भुत खेल-तमाशे देखकर मन को इस बात की होश नहीं कि यह संसार तो आवागमन है।

30सतगुरु की सेवा करने वाला इस रहस्य को बूझ लेता है और मोक्ष पा लेता है॥५॥

31सतगुरु ने रहस्य बताया है कि जिनको प्रभु दर की सूझ हो जाती है, वे अपना नाता कभी नहीं बिगाड़ते।

32वे सत्य एवं संयम का आचरण अपनाते हुए कर्म करते हैं और उनका आवागमन निवृत्त हो जाता है॥६॥

33जिनको गुरु ने सत्य नाम का आसरा प्रदान कर दिया है, वही सत्यशील हैं और सत्कर्म ही करते हैं।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं