सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 1232 · Raag Saarang · Guru Tegh Bahaadur Ji

1दिन-रात विषय-विकारों में आसक्त रहकर अपनी मनमर्जी करते रहे ॥१॥रहाउ॥।

2गुरु के उपदेश को कान लगाकर सुना नहीं और पराई नारी में ही लिपटे रहे।

3पराई निन्दा की वजह से बहुत भागदौड़ की परन्तु अच्छी बात समझाने पर भी समझ नहीं पाए ॥१॥

4मैं अपने कर्म किस तरह बताऊँ किं यह जन्म कैसे गंवा दिया है।

5नानक कहते हैं कि हे ईश्वर ! मुझ में अवगुण ही अवगुण हैं, अपनी शरण में बचा लो ॥ २ ॥ ४ ॥ ३ ॥ १३ ॥ १३६ ॥ ४ ॥ १५६ ॥

6रागु सारग असटपदीआ महला १ घरु १

7ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

8हे माँ ! ईश्वर के बिना मेरा जीना संभव नहीं।

9हे जगदीश्वर ! तेरी जय है।मैं तेरा ही यश चाहता हूँ, तेरे बिना मुझसे रहा नहीं जाता॥१॥रहाउ॥।

10प्रभु-मिलन की प्यास में मैं प्यासी कामिनी रात भर उसी का रास्ता देखती हूँ।

11उस नाथ ने मेरा मन वश में कर लिया है और वह प्रभु ही मेरे दिल का दर्द जानता है॥१॥

12प्रभु के बिना यह शरीर पीड़ा से भरा हुआ है और गुरु के उपदेश से ही प्रभु को पाया जाता है।

13हे प्रभु ! दयालु होकर मुझ पर कृपा करो, ताकि तुझ में ही विलीन हो जाऊँ ॥२ ॥

14हे मेरे मन ! यही कार्य करो किं परमात्मा के चरणों में चित लगा रहे।

15उसके मनोहर गुण गाकर हम आनंद से विस्मित हो गए और सहज स्वाभाविक प्रभु में लीन हो गए॥३॥

16इस हृदय में सदा हरि-नाम की निश्चल ध्वनि बजती रहती है, जो न तो घटती है और इसकी महत्ता अवर्णनीय है।

17सच्चे गुरु ने भेद बताया है कि हरि-नाम के बिना प्रत्येक व्यक्ति निर्धन है॥४॥

18हे सजनी ! जरा सुनोः प्रियतम प्राण मेरे हो गए हैं और कामादिक विकार विष खाकर समाप्त हो गए हैं।

19जब से प्रेम उत्पन्न हुआ है, वह उतना ही है और मेरा मन उसके प्रेम में आसक्त है॥५॥

20सहज स्वाभाविक मेरी परमात्मा से लगन लगी हुई है और उसके गुण गाकर जी रही हूँ।

21गुरु के उपदेश में लीन होकर वैराग्यवान हो गई हूँ और सच्चे घर में ही ध्यान लगाया हुआ है॥६॥

22अमृतमय हरि-नाम ही मुझे मीठा महारस लगा है और अन्तर्मन में ही मालिक प्राप्त हो गया है।

23गुरु से ऐसी शिक्षा प्राप्त की कि जहाँ पर मन को टिकाया था, वहाँ पर ही टिका हुआ है।॥७॥

24सनक-सनंदन, ब्रह्मा, इन्द्र इत्यादि परमात्मा की भक्ति तें लीन रहकर सफल हुए।

25गुरु नानक फुरमाते हैं कि परमेश्वर के बिना घड़ी भर भी जीना दूभर है, क्योंकि परमेश्वर के नाम में ही सब बड़ाई है॥८॥१॥

26सारग महला १ ॥

27परमेश्वर के बिना मेरे मन को किस तरह धैर्य हो सकता है ?

28वह करोड़ों कल्पों के दुखों को दूर करने वाला है और सत्य में विश्वस्त करके ही फैसला करता है॥१॥रहाउ॥।

29क्रोध का निवारण हुआ तो अहम्-भावना एवं ममत्व जल गए और मन में नवरंग प्रेम बस गया।

30प्रभु के पास प्रार्थना की तो सभी भय दूर हो गए, अब निर्मल प्रभु साथ ही रहता है।॥१॥

31एक शब्द में लगन लगाई तो चंचल बुद्धि छोड़ दी, इस तरह भय नाशक प्रभु को पा लिया।

32हरि-नाम रस को चखकर अपनी प्यास बुझा ली और अहोभाग्य से परमात्मा से मिलन हो गया ॥२॥

33खाली पड़ा मन रूपी सरोवर पूर्णतया भर गया है और गुरु की शिक्षा से परम सत्य को देखकर निहाल हो गया है।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं