सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 1228 · Raag Saarang · Guru Arjan Dev Ji

1ईश्वर ने कृपा करके अपना बना लिया है, अतः मन में उसके दर्शनों की प्यास उत्पन्न हो गई है।

2संत पुरुषों की संगत में परमात्मा का गुणगान किया, जिससे अन्य सब आशाएँ समाप्त हो गई हैं॥१॥

3संतों ने जग रूपी भयानक उजाड़ से निकालकर सच्चा मार्ग बतलाया है।

4नानक फुरमाते हैं कि संतों के दर्शन से सभी पाप नष्ट हो गए हैं और प्रभु रूपी रत्न पा लिया है॥२॥ १०० ॥ १२३॥

5सारग महला ५ ॥

6हे माई ! मेरा मन प्रेम की खुमारी में निमग्न है।

7मन को सुन्दर प्रभु-दर्शनों की तीव्र लालसा लगी हुई है, जिसे कोई तोड़ नहीं सकता॥१॥रहाउ॥।

8ईश्वर ही मेरा सर्वस्व है, वही मेरा प्राण, मान-प्रतिष्ठा, पिता, पुत्र, बंधु इत्यादि धन है।

9जो परमेश्वर के अतिरिक्त अन्य को मानता है, हड्डियों, विष्ठा एवं कीड़ों से भरा उसका शरीर धिक्कार योग्य है॥१॥

10दीनों के दुख नाश करने वाला पूर्व जन्म के कर्म फल के कारण हम पर कृपालु हो गया है।

11नानक का कथन है कि मैंने कृपानिधि, प्रेम के सागर प्रभु की शरण ली है, जिससे लोगों की निर्भरता समाप्त हो गई है ॥२॥ १०१ ॥१२४॥

12सारग महला ५ ॥

13राम भजन की सुरीली ध्वनि भली है।

14ईश्वर के अनुपम चरणों का जाप करने से जीव साधू कहलाता है॥१॥रहाउ॥।

15परमात्मा के दर्शन का चिन्तन कर वह पापों को धो डालता है।

16वह जन्म-मरण एवं विकारों के बीज को काट देता है॥१॥

17जिसके भाग्य में पूर्व से लिखा होता है, ऐसा कोई विरला ही भगवान को पाता है।

18हे नानक ! वह तो कर्ता परमेश्वर के गुण गाते हुए उस परम सत्य को ही खोज रहे हैं।॥२॥ १०२ ॥ १२५ ॥

19सारग महला ५ ॥

20हरि-नामोच्चारण करने वाले जिज्ञासु की बुद्धि उत्तम होती है।

21जो हरि को भुलाकर अन्य कर्मकाण्ड में तल्लीन होता है, उसका किया सब झूठा है॥१॥रहाउ॥।

22साधु पुरुषों की सभा में भगवान का भजन करो, सब पाप नष्ट हो जाते हैं।

23प्रभु-चरणों को हृदय में बसाने से जन्म-मरण से मुक्ति हो जाती है।॥१॥

24एकमात्र नामोच्चारण के आधार पर प्रभु ने कृपा कर हमें बचा लिया है।

25नानक कथन करते हैं कि दिन-रात परमात्मा का स्मरण करो, इसके फलस्वरूप ईश्वर के दरबार में सम्मान प्राप्त होता है॥ २ ॥ १०३ ॥ १२६ ॥

26सारग महला ५ ॥

27हे जीव-स्त्री! तुझे ईश्वर के दरबार में मान-प्रतिष्ठा प्राप्त हुई है,

28साधुजनों के साथ मिलकर भगवान का गुण-गान किया, जिससे अभिमान समाप्त हो गया ॥१॥रहाउ॥।

29प्रभु ने कृपा कर अपना बना लिया और गुरु से पूर्ण ज्ञान की प्राप्ति हुई।

30ठाकुर जी के दर्शनों एवं ध्यान में सर्व सुख एवं आनंद ही आनंद प्राप्त होता है।॥१॥

31वही सदा सुहागिन कहलाती है, जो प्रभु के आसपास रहती है और दसों दिशाओं में मशहूर होती है।

32नानक उस जीव-स्त्री पर कुर्बान जाता है, जो प्रियतम नारायण के रंग में लीन रहती है॥२॥ १०४ ॥ १२७ ॥

33सारग महला ५ ॥

34हे ईश्वर ! मुझे तुम्हारे चरणों का आसरा है।

35मैं तुझे ही अपना परिचित, रिश्तेरदार एवं साथी मानता हूँ, तू ही मेरा रखवाला है, जगत का ईश्वर है॥रहाउ॥।

36तू हमारा है, हम तुम्हारे कहलाते हैं, लोक-परलोक तू ही हमारी रक्षा करता है।

37तू बेअन्त है, अपरंपार है, केवल गुरु की कृपा से तुझे समझा जा सकता है॥१॥

38हे अन्तर्यामी ! तू बिना बोले, हमारे बिना कहने-कहलवाने पर भी मन की हर भावना को जानता है।

39नानक फुरमाते हैं कि जिसे प्रभु अपने चरणों में मिला लेता है, वही उसके दरबार में सम्मान प्राप्त करता है॥ २ ॥ १०५ ॥ १२८ ॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं