सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 1227 · Raag Saarang

1सारग महला ५ ॥

2हे माँ! प्रभु के चरणों में लीन हूँ।

3एक प्रभु के बिना अन्य को नहीं जानती और सब द्वैतभाव मिट गया है॥१॥रहाउ॥।

4ईश्वर वंदना को त्यागकर अन्य की अर्चना करना तो विषय-विकारों के कूप में गिरना है।

5उसके दर्शनों की प्यास ने मेरा मन मोह लिया है और घोर नरक से निकाल लिया है।॥१॥

6संतों की कृपा से सुख देने वाला प्रभु मिला है और अहम्-भावना नष्ट हो गई है।

7प्रभु रंग में लीन दास नानक का मन तन खिल उठा है॥२॥ ६५ ॥ ११८ ॥

8सारग महला ५ ॥

9हे भाई ! कच्चे रीति रिवाज, व्यवहार सब नाशवान हैं।

10साधू-महात्मा की संगत में परमात्मा का भजन करो; यही जगत में श्रेष्ठतम है॥१॥रहाउ॥।

11प्रभु-नाम हृदय में धारण कर लो, इधर उधर कदापि नहीं डोल सकोगे।

12जिस भाग्यशाली को गुरु-चरण रूपी जहाज मिल जाता है, वह संसार-सागर से पार उतर जाता है॥१॥

13जल, धरती, आकाश में सबका मालिक ही विद्यमान है।

14नानक अनुरोध करते हैं, हे भाई ! हरिनामामृत पान करो, क्योंकि अन्य सभी रस फीके हैं।॥२॥९६॥११९॥

15सारग महला ५ ॥

16मनुष्य तो ही रोता-चिल्लाता है, क्योंकि

17वह महा विकारों तथा मोह के नशे में मस्त रहता है और परमात्मा का भजन नहीं करता ॥१॥रहाउ॥।

18जो साधुजनों के साथ परमात्मा का जाप करते हैं, उनके पाप-दोष दूर हो जाते हैं।

19उनका शरीर और जन्म सफल एवं धन्य है, जो प्रभु के साथ मिले रहते हैं।॥१॥

20भले साधुजन तो काम, क्रोध, अर्थ, धर्म, मोक्ष एवं अठारह सिद्धियों से भी ऊपर हैं।

21दास नानक उनकी चरण-धूल की आकांक्षा करता है और उनके सान्निध्य में मुक्ति का अभिलाषी है॥ २ ॥ ६७ ॥ १२० ॥

22सारग महला ५ ॥

23हरि-भक्त हरिनाम की अभिलाषा करते हैं।

24वे मन, तन, वचन से केवल यही सुख चाहते हैं कि प्रभु के दर्शन कब होंगे ॥१॥रहाउ॥।

25हे परब्रह्म स्वामी ! तू बे-अन्त है, तेरी कीर्ति बताई नहीं जा सकती।

26मेरा मन तेरे चरण-कमल के प्रेम में बिंध गया है और इसे सर्वस्व मानकर अन्तर्मन में रखा हुआ है।॥१॥

27वेद, पुराण, स्मृतियों एवं साधुजनों ने अपनी जीभ से यही बात बताई है कि राम नाम का जाप कर मुक्ति पा लो।

28नानक फुरमाते हैं कि इसके अतिरिक्त अन्य सब बातें बेकार हैं ।२ ।६८॥ १२१ ॥

29सारग महला ५ ॥

30हे माया ! दरअसल तू परमात्मा की मक्खी है।

31जहाँ दुर्गन्ध होती है, वहाँ तू बैठ जाती है और महा विकारों को चखती रहती है।॥१॥रहाउ॥।

32इन आँखों से मैंने यही देखा है कि तू किसी भी स्थान पर टिक नहीं पाती।

33संतों के अलावा तूने किसी को नहीं छोड़ा, संत पुरुष तो गोविन्द की भक्ति में तल्लीन रहते हैं।॥१॥

34संसार के सब जीवों को तूने मोह लिया है और संतों के अतिरिक्त तेरा भेद कोई समझ नहीं पाया।

35दास नानक ईश्वर के कीर्तन में लीन है और उसने सुरति में शब्द को टिकाकर परम सत्य को साक्षात् पाया है॥२॥ ६६ ॥ १२२ ॥

36सारग महला ५ ॥

37अरी माँ! मैंने मौत का फन्दा काट दिया है,

38गृहस्थ जीवन में विरक्त रहकर ईश्वर का नाम जपकर सर्व सुख पा लिए हैं।॥१॥रहाउ॥।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं