गुरु ग्रंथ साहिब 1226 · Raag Saarang · Guru Arjan Dev Ji
1गुरु के सान्निध्य में मानव-जीवन को जीत लिया है और पुनः जुए में नहीं हारता॥१॥
2पूर्ण शब्द के चिन्तन द्वारा आठ प्रहर मैं प्रभु का गुणगान करता हूँ।
3हे प्रभु! नानक तेरे दासों का दास है और बार-बार तुझे प्रणाम करता है॥२॥ ८६ ॥ ११२ ॥
4सारग महला ५ ॥
5पावन आदि ग्रंथ में परमेश्वर का ही आवास है।
6साधु-पुरुष मिलकर प्रभु का गुणगान करते हैं और उनको पूर्ण ब्रह्म-ज्ञान की प्राप्ति होती है।॥१॥रहाउ॥।
7साधक, सिद्ध, सभी मुनिजन आकांक्षा करते हैं, पर विरले का ही ध्यान लगता है।
8जिस पर मेरा स्वामी कृपालु होता है, उसकी हर कामना पूर्ण होती है॥१॥
9जिसके हृदय में भयभंजन परमेश्वर बस जाता है, उसे समूचा संसार जानता है।
10हे मेरे प्रभु ! नानक यही वर चाहता है कि तू पल भर भी भूल मत ॥२॥९०॥११३॥
11सारग महला ५ ॥
12हर जगह पर कृपा की बारिश हुई है।
13आनंद-मंगल से हरि का यश गाओ, उसका प्रेम चारों ओर प्रगट हो गया है॥१॥ रहाउ॥।
14दसों दिशाओं, पूर्व-पश्चिम, उत्तर-दक्षिण सबमें प्रेम का सागर ईश्वर विद्यमान है, उसके बिना कोई स्थान नहीं।
15कृपानिधि पूर्ण परमेश्वर सब को देता रहता है॥१॥
16ईश्वर सत्य है, शाश्वत-स्वरूप है और साधुओं की संगत भी सत्य है।
17हे नानक ! जिन लोगों के मन में सत्य पर पूर्ण निष्ठा होती हैं, वे कभी नहीं भटकते ॥२॥ ६१ ॥ ११४ ॥
18सारग महला ५ ॥
19हे गोविन्द ! तू मेरे प्राणों का आसरा है।
20तू ही मेरा साजन, मित्र एवं मददगार है और तू ही मेरा परिवार है॥१॥रहाउ॥।
21तूने मेरे माथे पर अपना हाथ रखा तो साधुओं के संग तेरे ही गुण गाए।
22तुम्हारी कृपा से सभी फल प्राप्त हुए हैं और आनंदपूर्वक तेरे नाम का भजन किया है॥१॥
23सच्चे गुरु ने भक्ति की अटल नीव स्थापित की है, अब मन कभी नहीं डोलता।
24हे नानक ! जब गुरु परमेश्वर दयालु हो गया तो सर्व सुखों के भण्डार पा लिए ॥२॥ ६२ ॥ ११५ ॥
25सारग महला ५ ॥
26ईश्वर के नाम का सच्चा व्यवसाय ही निभने वाला है।
27ईश्वर के गुणानुवाद से सुखों का लाभ होता है और विकारों से निर्लिप्त रहा जाता है॥१॥रहाउ॥।
28अपने प्रभु का भजन करके सभी जीवों को संतोष प्राप्त हुआ है।
29उन्होंने अपना अमूल्य जीवन जीत लिया है और योनि-चक्र से मुक्ति पा गए हैं।॥१॥
30जब दयालु प्रभु कृपा करता है तो साधु पुरुषों की संगत मिल जाती है।
31हे नानक ! फिर हरि-चरणों की राशि प्राप्त हो जाती है और प्रभु से ही रंग लगा रहता है।॥२॥ ६३॥११६॥
32सारग महला ५ ॥
33हे माँ! प्रभु का कौतुक देखकर आश्चर्यचकित हो गई हूँ।
34मेरा मन अनहद धुन से मोहित हो गया है और उसका आनंद अद्भुत है॥१॥रहाउ॥।
35ईश्वर ही मेरा माता-पिता एवं बंधु है और मन को उसी से अटूट प्रेम है।
36साधु पुरुषों के साथ गोविंद के गुण गाए हैं, जिससे सभी भूलें नष्ट हो गई हैं।॥ १॥
37मेरी डोरी उसके चरणों के साथ लिपट गई है और सभी भ्रम भय दूर हो गए हैं।
38हे नानक ! दास ने एक ईश्वर को आसरा बना लिया है और अब वह पुनः योनियों के चक्र से छूट गया है॥२॥ ६४ ॥ ११७ ॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं