सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 1224 · Raag Saarang · Guru Arjan Dev Ji

1दास नानक प्रभु दर्शन ही चाहता है, वही मन तन का आसरा है॥ २ ॥ ७८ ॥ १०१ ॥

2सारग महला ५ ॥

3परमेश्वर के नाम बिना जीव मैला है।

4दरअसल विकारों की ठगबूटी पिला कर सच्चे प्रभु ने स्वयं ही इसे भुला दिया है॥१॥रहाउ॥।

5वह अनेक प्रकार से करोड़ों जन्म भटकता है और इसे कहीं स्थिरता प्राप्त नहीं होती।

6पूर्ण सतिगुरु से इसकी मुलाकात नहीं होती, जिस कारण शाक्त जीव आता जाता है॥१॥

7हे प्रभु ! तू समर्थ, दाता, अगम्य अपार है, मुझे बचा लो।

8दास नानक तेरी शरण में संसार-सागर से पार उतर गया है॥ २ ॥ ७६ ॥ १०२ ॥

9सारग महला ५ ॥

10अर्चना के लिए परमात्मा का भजन बढ़िया है।

11साधु पुरुषों के साथ परमेश्वर की अर्चना करो, इसका स्वाद अमृतमय है॥१॥रहाउ॥।

12अटल अविनाशी प्रभु का स्मरण करने से माया का अभिमान समाप्त हो जाता है।

13अनाहद वाणी की ध्वनि में परम आनंद प्राप्त होता है और दुख -तकलीफ का दुबारा सामना नहीं करना पड़ता ॥१॥

14सनक-सनंदन, ब्रह्मा, शुकदेव, प्रहलाद इत्यादि सब परमात्मा के गुण गाते हैं।

15हे नानक ! अद्भुत हरि रस के अमृत जल का पान करने से परमानंद प्राप्त होता है॥ २ ॥ ८० ॥ १०३ ॥

16सारग महला ५ ॥

17मनुष्य ने पापों का बहुत बड़ा दुर्ग बनाया हुआ है।

18वह दिन-रात इसमें थकता नहीं और न ही कभी पापों में छूट आती है॥१॥रहाउ॥।

19इस तरह मनुष्य ने सिर पर महावज़ विषय रोगों की पोटली उठाई हुई है।

20वह पल में ही खुल जाती है और मौत उसे अपना शिकार बना लेती है॥१॥

21तदन्तर मनुष्य पशु-प्रेत, ऊँट, गधे इत्यादि अनेक योनियों में आता है।

22नानक अनुरोध करते हैं कि हे मनुष्य ! साधु पुरुषों के साथ ईश्वर का भजन कर लो, फिर कोई चोट नहीं लगेगी॥२॥ ८१ ॥१०४॥

23सारग महला ५ ॥

24अन्धे व्यक्ति पापों का जहर खाते हैं।

25उनकी ऑखें, कान, शरीर सब कमजोर हो गया है और श्वास-तत्व भी कम हो गया है॥१॥रहाउ॥।

26गरीबों को कष्ट पहुँचा कर अपना पेट भरते हैं, परन्तु ऐसी दौलत भी अंततः साथ छोड़ जाती है।

27इस तरह उम्र भर पाप करते-करते पछताते हैं, मगर पाप-धन का कभी साथ नहीं छोड़ते ॥१॥

28निंदक को यमदूत आकर मार देता है और सिर से पटकता है।

29हे नानक ! व्यक्ति अपने पापों की कटार अपने ऊपर मारता है और अपने मन को चोटिल करता है ॥२॥ ८२॥ १०५ ॥

30सारग महला ५ ॥

31निंदक लोगों की अधबीच में ही जीवन डोर टूट जाती है।

32भक्तों को बचाने वाला स्वयं मालिक है, परन्तु विमुख जीव के पास मौत आ पहुँचती है॥१॥रहाउ॥।

33उसकी फरियाद कोई नहीं सुनता और कहीं भी वह आसरा नहीं पाता।

34यहाँ दुखी रहता है, आगे नरक भोगता है, इस प्रकार अनेक योनियों में भटकता है॥१॥

35ऐसा व्यक्ति दुनिया भर में मशहूर हो जाता है और अपने किए कमों का ही फल पाता है।

36हे नानक ! बिना किसी डर के स्रष्टा की शरण में आओ और आनंद मंगल से उसका गुणानुवाद करो ॥२॥ ८३ ॥ १०६॥

37सारग महला ५ ॥

38तृष्णा बहुत प्रकार से चलती है,

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं