गुरु ग्रंथ साहिब 1223 · Raag Saarang · Guru Arjan Dev Ji
1ईश्वर ही मेरा सज्जन, मित्र एवं हितैषी है और उसके ही गुण गाता हूँ।
2वह पल भर हृदय से भूल न जाए, इसलिए पूर्ण गुरु ने मुझे उससे मिला दिया है॥१॥
3वह कृपा करके अपने दास की रक्षा करता है, सभी जीव उसी के वश में है।
4हे नानक ! केवल पूर्ण परमेश्वर में ही लगन लगी हुई है और उसे कोई भय नहीं ॥२॥ ७३ ॥ ६६ ॥
5सारग महला ५ ॥
6जिसका बल ईश्वर होता है,
7उसके सभी मनोरथ पूर्ण होते हैं और कोई दुख प्रभावित नहीं करता ॥१॥रहाउ॥।
8जो व्यक्ति प्रभु का भक्त एवं दास है, उसकी कीर्ति सुनकर जी रहा हूँ।
9उसके दर्शन का प्रयत्न करता हूँ, पर यह भाग्य से ही प्राप्त होता है।॥१॥
10गुरु की कृपा से आँखों से प्रभु को निहारता हूँ, अन्य किसी को नहीं।
11नानक की विनती है कि अपने सेवक को यह दान दो कि संतों के चरण धो कर जीता रहूँ॥२॥ ७४ ॥ ६७ ॥
12सारग महला ५ ॥
13मैं राम के गुण गा कर जीता हूँ।
14हे परमेश्वर ! कृपा करो, कभी भूल मत जाना ॥१॥रहाउ॥।
15हे स्वामी ! मन, तन, धन सब तुम्हारा दिया हुआ है, तेरे सिवा मैं किसी को नहीं मानता।
16जैसे तू रखता है, वैसे ही रहना है और तुम्हारा दिया खाना एवं पहनना है॥१॥
17मैं साधु-पुरुषों पर कुर्बान जाता हूँ, इनकी संगत में आवागमन से मुक्ति हो जाती है।
18हे प्रभु ! दास नानक तेरी शरण में है, ज्यों चाहते हो, वैसे ही चलाओ ॥ २ ॥ ७५ ॥ ६८ ॥
19सारग महला ५ ॥
20हे मन ! हरि-नाम सर्व सुखों का सार है और
21अन्य कार्य माया के विकार हैं, जो सब धूल नज़र आते हैं।॥१॥रहाउ॥।
22पतित प्राणी अंधे कुएं में पड़कर घोर नरक के अंधेरे में डूब जाता है।
23वह अनेक योनियों में भटकता हुआ पुनः पुनः भटकता है॥१॥
24हे परमेश्वर ! तू पतितों को पावन करने वाला है, भक्तवत्सल है, दोनों पर कृपा धारण करने वाला है।
25नानक हाथ जोड़कर कामना करते हैं कि साधुजनों की संगत में हमारा उद्धार करो ॥२॥ ७६ ॥ ६६ ॥
26सारग महला ५ ॥
27ईश्वर की महिमा सब ओर फैली हुई है,
28इससे आधि, व्याधि, उपाधि, तीन प्रकार के रोग विनष्ट हो जाते हैं।॥१॥रहाउ॥।
29हमारी तृष्णा बुझ गई है, सभी आकांक्षाएं पूर्ण हुई हैं और शोक संताप समाप्त हुए हैं।
30अविनाशी निरंकार का गुणगान करते हुए मन, तन एवं आत्मा को तृप्ति मिली है॥१॥
31साधु-महात्मा की संगत में जीव का काम, क्रोध, लोभ, ईष्र्या-द्वेष का अन्त हो जाता है।
32नानक का माई-बाप निरंकार भक्तवत्सल एवं सब भय काटनेवाला है॥२॥ ७७ ॥ १०० ॥
33सारग महला ५ ॥
34प्रभु नाम बिना पूरी दुनिया व्याकुल है।
35कुतिया आशा से इसकी तृप्ति नहीं होती और इसे विकारों की मिट्टी लगी रहती है।॥१॥रहाउ॥।
36परब्रह्म ने ठग-बूटी डालकर मनुष्य को स्वयं भुलाया हुआ है, इसी वजह से वह बार-बार जन्मता-मरता है।
37वह एक पल भी परमात्मा का भजन नहीं करता, अतः यमदूत इसे तंग करता है॥१॥
38हे करुणानिधि ! तू दीनों के दुख नाश करने वाला है, कृपा करो, हम तेरे संत पुरुषों की धूल हैं।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं