सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 1221 · Raag Saarang · Guru Arjan Dev Ji

1खोजते-खोजते यही सार-तत्व निकला है कि भक्ति ही श्रेष्ठ एवं पूर्ण है।

2हे नानक ! राम नाम के सिवा अन्य सभी तरीके अधूरे व असफल है ॥२॥ ६२॥ ८५ ॥

3सारग महला ५ ॥

4सच्चा सतिगुरु सबको देने वाला है,

5उसके दर्शनों से सभी दुख दूर हो जाते हैं, मैं उसके चरण-कमल पर कुर्बान जाता हूँ॥१॥रहाउ॥।

6परमेश्वर सत्य है, साधुजन सत्य हैं और हरि का नाम निश्चल है।

7हे सज्जनो ! परब्रह्म की भक्ति करो, उस अविनाशी के गुण गाओ ॥१॥

8वह अपहुँच, मन-वाणी से परे है, उसकी शक्ति का रहस्य नहीं पाया जा सकता, वह सबका आसरा है।

9नानक का कथन है कि उस परमात्मा की प्रशंसा करो, जिसका कोई अन्त व आर-पार नहीं ॥२॥ ६३॥ ८६ ॥

10सारग महला ५ ॥

11गुरु के चरण मेरे मन में बस गए हैं।

12मालिक हर स्थान में मौजूद है, निकट ही रहता है, सबसे पास है॥१॥रहाउ॥।

13संतों के संग प्रेम हुआ तो बन्धनों को तोड़कर हमने ईश्वर में लगन लगा ली।

14हमारा जन्म पावन हो गया और सब कामनाएँ पूरी हो गई।॥१॥

15जिस पर मेरा प्रभु कृपा करता है, वही उसका यशोगान करता है।

16हे नानक ! वह आठ प्रहर गोविंद के गुण गाता है, मैं सदैव उस पर बलिहारी जाता हूँ॥२॥ ६४॥ ८७ ॥

17सारग महला ५ ॥

18जीवन तो ही सफल माना जाए यदि परमेश्वर के दर्शन हो जाएँ।

19हे प्रियतम प्रभु ! कृपा करके भ्रम की रेखा को फोड़ दो ॥१॥रहाउ॥।

20कहने अथवा सुनने से शान्ति प्राप्त नहीं होती और बिना विश्वास के कोई क्या सीख सकता है।

21प्रभु को त्याग कर जो अन्य को चाहता है, उसके मुँह पर कालिमा ही लगती है॥१॥

22जिसके पास सर्व सुख देने वाला ईश्वर है, वह किसी सम्प्रदाय अथवा देवी-देवता को नहीं मानता।

23हे नानक ! ईश्वर के दर्शनों में निमग्न मन मोहित हो जाता है और सर्वमनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं।॥२॥ ६५ ॥ ८८ ॥

24सारग महला ५ ॥

25केवल राम नाम का सिमरन करो,

26इससे पल में सब पाप-अपराध जल जाते हैं और करोड़ों दान-स्नान का फल प्राप्त होता है॥१॥रहाउ॥

27अन्य जंजालों में मेहनत करना बेकार है और प्रभु के बिना सब ज्ञान अनुपयोगी हैं।

28जगदीश्वर का भजन करने से जन्म-मरण के संकट से छुटकारा हो जाता है और उसके ध्यान में रत रहने से सुखों की प्राप्ति होती है॥१॥

29हे पूर्ण सुखसागर ! मैं तेरी शरण में आया हूँ, कृपा करके भक्ति का दान दो।

30नानक की विनती है कि हे प्रभु ! तेरे सुमिरन (स्मरण) से ही जीता हूँ और इससे मेरा अभिमान नष्ट हो जाता है॥२॥ ६६ ॥ ८६ ॥

31सारग महला ५ ॥

32असली धूर्त वही है, जो ऑकार के चिंतन में लीन होता है।

33वही सर्वोत्तम है, वही धनवान् है, जो परमात्मा के प्रेम-रस में निमग्न होता है।॥१॥रहाउ॥।

34जो छल-कपट करता है, परन्तु लाभ को नहीं जानता, ऐसा व्यक्ति धूर्त नहीं, असल में मूर्ख है।

35वह लाभ छोड़कर नुक्सान वाले ही कार्यो में रचा रहता है और सुन्दर प्रभु का भजन नहीं करता ॥१॥

36वास्तव में वही चतुर, बुद्धिमान, पण्डित है, वही शूरवीर एवं दानशील है।

37जिसने साधु संगत में परमात्मा का जाप किया है, नानक का कथन है कि वही प्रभु को परवान होता है।॥२॥ ६७ ॥ ६० ॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं