सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 1220 · Raag Saarang · Guru Arjan Dev Ji

1जो छल-कपट छोड़कर निर्वेर सज्जन बनकर रहता है, वह प्रभु को आसपास ही देखता है।

2वह सच्चे नाम धन का व्यापार करता है, सच्चा धन ही संचित करता, इस तरह कभी हार का मुँह नहीं देखता ॥१॥

3हरिनाम के असंख्य ही भण्डार भरे हुए हैं, इसे खाने अथवा खर्च करने से कभी कमी नहीं आती।

4हे नानक ! इस तरह शोभापूर्वक परब्रह्म के द्वार पर जाओ ॥२॥ ५७ ॥ ८० ॥

5सारग महला ५ ॥

6हे प्रभु ! मुझ अनाथ, बेचारे, नाचीज को

7किस आधार पर तूने मनुष्य बना दिया, यह सब तुम्हारा प्रताप है॥१॥रहाउ॥।

8तुम जीवन, प्राण इत्यादि सब देने वाले हो, तुम्हारे अपार गुण अकथनीय हैं।

9तू सबका प्रियतम है, समूचे संसार का प्रतिपालक है, सबके हृदय का आसरा है॥१॥

10तुम्हारी महिमा व शक्ति को कोई नहीं जानता और संसार का प्रसार तेरा ही है।

11नानक का कथन है कि साधु पुरुषों की नाव में बैठने से संसार-सागर से पार उतारा हो जाता है॥२॥ ५८ ॥ ८१ ॥

12सारग महला ५ ॥

13कोई खुशकिस्मत ही परमात्मा की शरण में आता है।

14वह प्रभु के अतिरिक्त किसी अन्य को नहीं मानता और अन्य सब उपाय त्याग देता है।॥ १॥ रहाउ ॥

15वह मन, वचन एवं कर्म से ईश्वर की आराधना करता है और साधु पुरुषों की संगत में सुख पाता है।

16वह अकथनीय कथा के रस में आनंद विनोद करता है और सहज स्वाभाविक परम सत्य में लीन रहता है।॥१॥

17कृपा करके भगवान ने जिसे अपना बना लिया है, उसकी वाणी उत्तम है।

18नानक फुरमाते हैं कि जो लोग प्रभु की भक्ति में रत रहते हैं, साधुसंगत में वे जगत-सागर से मुक्त हो जाते हैं।॥२॥ ५६ ॥ ८२ ॥

19सारग महला ५ ॥

20जबसे साधु महापुरुष की शरण ली है,

21मन में परम सुख व शान्ति का आलोक हो गया है और कोई दुख-दर्द नहीं रहा ॥१॥रहाउ॥।

22हे प्रभु ! हमने यही विनती की है कि कृपालु होकर अपना नाम प्रदान करो।

23प्रभु-स्मरण से अन्य सभी व्यवहार भूल गए हैं और यही सच्चा लाभ पाया है॥१॥

24जहाँ से उत्पन्न हुए, वहीं समा गए, वहीं बस रहे हैं।

25नानक फुरमाते हैं कि गुरु ने मेरा भ्रम दूर कर दिया है और आत्म-ज्योति परम-ज्योति में विलीन हो गई है॥२॥ ६० ॥ ८३ ॥

26सारग महला ५ ॥

27हे सज्जनो ! जिव्हा से राम का यशोगान करो।

28अन्य संसारिक स्वाद भुला दो, क्योंकि हरिनाम भजन का स्वाद सबसे उत्तम है॥ १॥ रहाउ ॥

29हरि के चरण-कमल हृदय में बसाकर केवल उसी में लगन लगाओ।

30साधु पुरुषों की संगत में मन निर्मल हो जाता है और पुनः योनि चक्र में नहीं आना पड़ता ॥१॥

31हे प्रभु ! आत्मा एवं प्राणों को तेरा ही आसरा है, तू आश्रयहीनों का आश्रय है।

32नानक का कथन है कि मैं श्वास-श्वास से प्रभु का चिंतन करता हूँ और उस पर सदैव कुर्बान जाता हूँ॥२॥ ६१॥ ८४ ॥

33सारग महला ५ ॥

34भगवान के चरणों का नित्य ध्यान ही वैकुण्ठ है।

35साधु-संगत में मोक्षदायक अमृत हरिनाम मिलता है।॥१॥रहाउ॥।

36हे भगवान ! कृपा करो, ताकि कानों से उत्तम कथा सुनता रहूँ।

37इससे जीवन-मृत्यु दोनों ही पक्ष पूर्ण होते हैं और सुख-शान्ति मिलती है॥१॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं